मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्टि के लिए टीवी चैनल बदलने लगा तो किसी ने मोबाइल का सहारा लिया. सभी लोग अपने-अपने स्तर पर घोषणा की पुष्टि में जुट गए. यह घोषणा थी 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद करने की.
8 नवंबर की रात 8 बजे पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया, नोटबंदी की घोषणा की और कालेधन कुबेरों से निपटने के लिए 50 दिन का वक़्त मांगा. पहले तो देश की जनता को अपने ही कानों पर यकीन नहीं हुआ लेकिन लोगों ने नोटबंदी को एक बेहतर फैसला माना और पीएम मोदी के नोटबंदी वाले महायज्ञ में तन-मन और जन से जुट गए.
पीएम मोदी ने 50 दिन का समय तो मांगा ही था, साथ में ये भी कहा था कि मित्रों घबराने की जरूरत नहीं है, जल्द ही हालात सामान्य हो जाएंगे. आपको किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी. पीएम मोदी के भाषण के 2 दिन बाद नोटबंदी का वह महायज्ञ शुरू हुआ जिसे लेकर लोगों की उम्मीदें थी कि इसके हवनकुंड में सारा कालाधन स्वाहा हो जाएगा.
नोटबंदी की घोषणा के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि हर रोज नोटबंदी के नियम बदले गए, क्योंकि सिर्फ 43 दिनों में ही 59 बार नियम बदले गए. आज 50 दिन पूरे होने के बाद भी 50 फीसदी एटीएम में पैसे नहीं हैं. बैंकों की भी हालत वैसी ही है जैसे नोटबंदी के पहले दिन थी.
सोचने वाली बात ये है कि जिस सरकार ने नोटबंदी की घोषणा में कहा कि बेचैन होने और घबराने की जरूरत नहीं है. 31 दिसंबर तक आप बैंकों में आराम से पैसे जमा करा सकते हैं और पुराने नोट बदलवा सकते हैं. उसी सरकार की ओर से एक और फरमान आया कि बैंकों में अब केवल पैसे जमा होंगे, बदले नहीं जाएंगे. लोगों ने इस फैसले को भी स्वीकार किया. तभी एक और फैसला आया कि बैंक में पैसे जमा करने से पहले आपको सफाई देनी होगी कि अभी तक आप कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.
सरकार ने हर रोज नियम बदले, कभी पैसे बदलवाने की सीमा तय की गई तो कभी पुराने नोट कहां चलेंगे और कहां नहीं, इसी सूचना दी गई. यहां यह भी बात गौर करने वाली है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों एकमत नहीं दिखे. वित्त मंत्री ने कहा कि पैसे जमा करने पर आपसे कोई सवाल-जवाब नहीं होगा, लेकिन बैंक में पैसे जमा करने जाओ तो लिखित में बताना पड़ रहा है कि अभी तक कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.
नोटबंदी के बाद सरकार के महायज्ञ में खुद को झोंकते हुए हर फैसले को लोगों ने स्वीकार किया. लोगों ने पेटीएम का इस्तेमाल करना भी सीख लिया. गोलगप्पे वाले से लेकर सब्जी वाले, ठेले वाले, यहां तक की मोची ने भी पेटीएम से पैसे लेना शुरू कर दिया. इसी बीच 25 दिसंबर को स्टेट बैंक की ओर से एक ट्वीट किया गया कि स्टेट बैंक के ग्राहक पेटीएम इस्तेमाल नहीं कर सकते. उन्हें सलाह दी जाती है कि वे स्टेट बैंक की निजी ऐप बेस्ट बड्डी का इस्तेमाल करें.
एक फैसला और था जिसने आम जनता को झकझोर दिया. यह फैसला था कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से पुराने नोटों की जितनी रकम चाहें, बैंक में जमा करवा सकते हैं. वित्त मंत्रालय के राजस्व सचिव ने अपने एक बयान में कहा कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से कितनी भी रकम पुराने नोटों में बैंक में जमा करवा सकते हैं और उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी, लेकिन अगर कोई साधारण नागरिक ढाई लाख रूपए से ज्यादा की रकम बैंक में जमा करवाता है तो उससे आयकर विभाग सवाल-जवाब करेगी.
इस छूट के पीछे लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी का हवाला दिया गया. लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल देश के किसी भी व्यक्ति या कंपनी से कितनी भी छोटी या बड़ी रकम का स्वैच्छिक दान ले सकता है. उसे बस 20 हजार से ज्यादा का चंदा देने वाले लोगों के नाम चुनाव आयोग को बताना पड़ता है.
तो क्या नोटबंदी का फैसला देश की आम जनता की मेहनत से कमाई हुई राशि को बैंक में लाने के लिए था, जिसे कालाधन का तमगा लगाकर सरकार अपनी सेखी बघार सके और बाद में ये कह सके कि नोटबंदी के बाद बैंकों में इतने कालेधन जमा हुए हैं.
बाकी इन पचास दिनों में आप तो समझ ही चुके होंगे कि नोटबंदी का फैसला किसके लिए था, असली काले धन-कुबेरों के लिए या देश के तमाम नेताओं के लिए या फिर आम आदमी के पैसों को बैंकों में लाने के लिए ?



















