गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?


मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्टि के लिए टीवी चैनल बदलने लगा तो किसी ने मोबाइल का सहारा लिया. सभी लोग अपने-अपने स्तर पर घोषणा की पुष्टि में जुट गए. यह घोषणा थी 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद करने की.

8 नवंबर की रात 8 बजे पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया, नोटबंदी की घोषणा की और कालेधन कुबेरों से निपटने के लिए 50 दिन का वक़्त मांगा. पहले तो देश की जनता को अपने ही कानों पर यकीन नहीं हुआ लेकिन लोगों ने नोटबंदी को एक बेहतर फैसला माना और पीएम मोदी के नोटबंदी वाले महायज्ञ में तन-मन और जन से जुट गए.



पीएम मोदी ने 50 दिन का समय तो मांगा ही था, साथ में ये भी कहा था कि मित्रों घबराने की जरूरत नहीं है, जल्द ही हालात सामान्य हो जाएंगे. आपको किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी. पीएम मोदी के भाषण के 2 दिन बाद नोटबंदी का वह महायज्ञ शुरू हुआ जिसे लेकर लोगों की उम्मीदें थी कि इसके हवनकुंड में सारा कालाधन स्वाहा हो जाएगा.

नोटबंदी की घोषणा के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि हर रोज नोटबंदी के नियम बदले गए, क्योंकि सिर्फ 43 दिनों में ही 59 बार नियम बदले गए. आज 50 दिन पूरे होने के बाद भी 50 फीसदी एटीएम में पैसे नहीं हैं. बैंकों की भी हालत वैसी ही है जैसे नोटबंदी के पहले दिन थी.

सोचने वाली बात ये है कि जिस सरकार ने नोटबंदी की घोषणा में कहा कि बेचैन होने और घबराने की जरूरत नहीं है. 31 दिसंबर तक आप बैंकों में आराम से पैसे जमा करा सकते हैं और पुराने नोट बदलवा सकते हैं. उसी सरकार की ओर से एक और फरमान आया कि बैंकों में अब केवल पैसे जमा होंगे, बदले नहीं जाएंगे. लोगों ने इस फैसले को भी स्वीकार किया. तभी एक और फैसला आया कि बैंक में पैसे जमा करने से पहले आपको सफाई देनी होगी कि अभी तक आप कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.

सरकार ने हर रोज नियम बदले, कभी पैसे बदलवाने की सीमा तय की गई तो कभी पुराने नोट कहां चलेंगे और कहां नहीं, इसी सूचना दी गई. यहां यह भी बात गौर करने वाली है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों एकमत नहीं दिखे. वित्त मंत्री ने कहा कि पैसे जमा करने पर आपसे कोई सवाल-जवाब नहीं होगा, लेकिन बैंक में पैसे जमा करने जाओ तो लिखित में बताना पड़ रहा है कि अभी तक कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.

नोटबंदी के बाद सरकार के महायज्ञ में खुद को झोंकते हुए हर फैसले को लोगों ने स्वीकार किया. लोगों ने पेटीएम का इस्तेमाल करना भी सीख लिया. गोलगप्पे वाले से लेकर सब्जी वाले, ठेले वाले, यहां तक की मोची ने भी पेटीएम से पैसे लेना शुरू कर दिया. इसी बीच 25 दिसंबर को स्टेट बैंक की ओर से एक ट्वीट किया गया कि स्टेट बैंक के ग्राहक पेटीएम इस्तेमाल नहीं कर सकते. उन्हें सलाह दी जाती है कि वे स्टेट बैंक की निजी ऐप बेस्ट बड्डी का इस्तेमाल करें.


एक फैसला और था जिसने आम जनता को झकझोर दिया. यह फैसला था कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से पुराने नोटों की जितनी रकम चाहें, बैंक में जमा करवा सकते हैं. वित्त मंत्रालय के राजस्व सचिव ने अपने एक बयान में कहा कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से कितनी भी रकम पुराने नोटों में बैंक में जमा करवा सकते हैं और उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी, लेकिन अगर कोई साधारण नागरिक ढाई लाख रूपए से ज्यादा की रकम बैंक में जमा करवाता है तो उससे आयकर विभाग सवाल-जवाब करेगी.

इस छूट के पीछे लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी का हवाला दिया गया. लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल देश के किसी भी व्यक्ति या कंपनी से कितनी भी छोटी या बड़ी रकम का स्वैच्छिक दान ले सकता है. उसे बस 20 हजार से ज्यादा का चंदा देने वाले लोगों के नाम चुनाव आयोग को बताना पड़ता है.

तो क्या नोटबंदी का फैसला देश की आम जनता की मेहनत से कमाई हुई राशि को बैंक में लाने के लिए था, जिसे कालाधन का तमगा लगाकर सरकार अपनी सेखी बघार सके और बाद में ये कह सके कि नोटबंदी के बाद बैंकों में इतने कालेधन जमा हुए हैं.

बाकी इन पचास दिनों में आप तो समझ ही चुके होंगे कि नोटबंदी का फैसला किसके लिए था, असली काले धन-कुबेरों के लिए या देश के तमाम नेताओं के लिए या फिर आम आदमी के पैसों को बैंकों में लाने के लिए ?

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

नाम से भविष्य तय होता तो रणवीर आर्मी चीफ होते, ममता-मायावती अनाथालय चलातीं, पीएम मोदीखाना और...


जब से करीना कपूर ने बच्चे को जन्म दिया है तब से बधाईयाँ कम, शिक़ायतें ज़्यादा मिल रही हैं। मुबारक़बाद देने वालों की संख्या कम, आलोचकों की संख्या कुछ ज़्यादा ही हो गई है। बच्चे ने अभी आँखें भी नहीं खोली कि उसके कानोंं में यह बात गूंजने लगी कि तेरे बाप ने तेरा नाम तैमूर रखा है, तू तैमूर की तरह ही खूंखार होगा, तू उसी की तरह लोगों को सताएगा और तू उसी की तरह बर्बरता की हदें पार करेगा।

मु्द्दे पर आने से पहले तैमूर लंग के अंदर भी झाँक लेना ज़रूरी है। तैमूर 14वीं सदी का शासक था। प्रत्यक्ष रूप से तो वह दुनिया का सबसे बर्बर और निष्ठुर शासकों में से एक था, लेकिन जो अप्रत्यक्ष है उस पर ग़ौर करना भी ज़रूरी है। उसे मुस्लिम कहना भी पूरी तरह से जायज़ नहीं है, क्योंकि उसके पिता ने इस्लाम कबूल किया था। उसका इरादा सिकंदर और चंगेज खां की तरह विश्वविजेता बनना था। तैमूर के बारे में अधिक जानने के लिए आप गूगल बाबा या इतिहास की किताब का सहारा ले सकते हैं।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर कि करीना कपूर और सैफ अली खान के बेटे के तैमूर नाम से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है? लोगों को नाम से इतनी नफरत क्यों हो रही है? क्या इसलिए कि तैमूर लंग एक मुस्लिम शासक था या फिर इसलिए कि वह बर्बर शासक था? बर्बर तो हिटलर भी था। मेरे ख़्याल से तो जिन लोगों को तैमूर नाम से दिक्कत है वे या तो छोटी मानसिकता के हैं या फिर उन्हें फिर किसी जाति विशेष से नफरत है और यदि जाति विशेष से नफरत है तो यही विरोध उस समय क्यों नहीं हुआ जब  2012 में करीना ने सैफ का हाथ थामा. दूसरी बात यदि मानसिक दिक्कत है तो इसका कोई इलाज नहीं है, यह लाइलाज है।

KAREENA FAKE

नाम से भविष्य तय होता है क्या ?

जो लोग करीना के बेटे के नाम से कूढ़ रहे हैं उनके साथ ये भी दिक्कत है कि उन्हें लगता है कि नाम से ही भविष्य तय होता है। चलिए हम उनकी बात थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि नाम से भविष्य तय होता है तो फिर राम सिंह को राम की तरह होना चाहिए, जबकि वह एक डाकू था। कल्याण सिंह गूजर भी एक डाकू था, जबकि उसे लोगों का कल्याण करना चाहिए था। इस लिहाज से तो बसपा सुप्रीमो मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अनाथालय चलाना चाहिए, क्योंकि दोनोंं के नाम से ममता छलक रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मोदीखाना (किराने की दुकान) चलाना चाहिए था। अभिनेता रणवीर सिंह को आर्मी चीफ होना चाहिए था, क्योंकि उनके नाम में रण भी है और वीर भी है। नवाज शरीफ़ और राहिल शरीफ़ को भी शरीफ़ होना चाहिए था, लेकिन फिलहाल जो वे हैं ये बताने की ज़रूरत नहीं है।

 नोट- करीना की बेटे के साथ इस फोटो की जाँच की जा रही है, क्योंकि इस फोटो पर अभी संदेह है कि यह असली फोटो है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मोदी जी के नाम बंद ख़त : आप कालिदास मत बनिए प्लीज़...


आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,

मोदी जी आपने कालिदास की वह कहानी तो सुनी ही होगी, जिसके लिए उन्हें मूर्ख का तमगा मिला. वैसे तो आप में और कालिदास जी में काफी अंतर है. वह अंतर यह है कि कालिदास जिस पेड़ की डाली पर बैठे थे उसे वे ख़ुद ही काट रहे थे और आप जिस पेड़ की डाली पर हैं उसे आपके शुभचिंतक काट रहे हैं.

कालिदास जी को एक ओर जहां उनकी विद्वता के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें मूर्ख की श्रेणी में भी रखा गया है. हाल के कुछ दिनों से जिस तरह से आपके फ़ैसले हो रहे हैं उनमें कालिदास की मूर्खता वाली छवि साफ़ नज़र आ रही है.

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आपने 8 नवंबर को रात 8 बजे नोटबंदी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन आपने दूर का नहीं सोचा. क्योंंकि शायद आप संस्कृत के इस श्लोक में यक़ीन नहीं करते हैं कि 'अग्र सोची सदा सुखी'. नोटबंदी के बाद जिस तरह से देश के हालात बदले उससे आपको भी अफ़सोस हो ही रहा होगा.

आपके ज़ेहन में यह बात बार-बार उफान मार रही होगी कि बिना तैयारी नोटबंदी का फ़ैसला ग़लत था. हालात को देखकर यह भी कह सकते हैं कि वह फ़ैसला आपका नहीं था, क्योंकि इतना तो देश के लोगों को मालूम ही है कि आपके फ़ैसले बिना तैयारियों के नहीं होते.

मोदी जी, ज़रा सोचिए कि हम स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने जाते है और पहुँचने पर पता चलता है कि ट्रेन रद्द कर दी गई है या उसकी जगह दूसरी ट्रेन को दूसरे समय पर रवाना किया जाएगा तो कितनी परेशानी होती है. यहां तो नोटबंद के नियमों मे रोज़ बदलाव हो रहे हैं. तो सोचिए लोगोंं की क्या हालत हो रही है.

यहां एक और बात ग़ौर करने वाली है कि जनता इतना कष्ट सहते हुए भी आपके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा रही है, क्योंकि आपने उसे अच्छे दिनों का सपना दिखा रखा है, लेकिन अब जनता के तेवर बदलने लगे  हैं.

नोटबंदी के बाद विपक्षी दलों ने कहा कि मोदी सरकार ने नोटबंदी की जानकारी अपने लोगों को पहले ही दे दी थी तो सरकार की ओर से बयान आया कि नोटबंदी की जानकारी कुछ तय लोगों को छोड़कर बाक़ी किसी को नहीं थी. वहीं दूरदर्शन के एक पत्रकार के दावे को मानें तो नोटबंदी पर आपके भाषण की रिकॉर्डिंग 1 महीने पहले ही हो गई थी.

आपने नोटबंदी की घोषणा कालेधन को निकालने के लिए की, लेकिन पता चला कि कालेधन रातों-रात सफ़ेद किए जा रहे हैं. नोट बदलवाने के लिए आम आदमी लाइन में खड़ा मौत को गले लगा रहा है और नेताओं के लिए रात में भी बैंक खोले जा रहे हैं.

महाराष्ट्र के सहकारी बैंकों में बैक डेट में ड्राफ़्ट बने, बॉण्ड ख़रीदे गए और पैसे सफेद किए गए. तो क्या ये पैसे सफ़ेद करवाने वाले आम आदमी थे. बिल्कुल नहीं, ये वे लोग थे जिनके कालेधन को निकालने के लिए आपने नोटबंदी की. स्थिति यथावत है.

नोटबंदी के बाद आपने सोना पर धावा बोला, आपने घर में  सोना रखने की सीमा तय की. आपके नए क़ानून के मुताबिक विवाहित महिलाएँ घर में 500 ग्राम, अविवाहित महिलाएँ 250 ग्राम सोना और पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकते हैं. वहीं पुश्तैनी गहनों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

आपने यहाँ भी वही ग़लती की जो आपने नोटबंदी के समय की थी. आपने इस बार भी आगे-पीछे का कुछ नहीं सोचा, बस क़ानून बना दिया. अब यहाँ सवाल ये है कि आप कैसे तय करेंगे कि किसी के घर में रखा गहना पुश्तैनी है, क्योंकि यदि आपको ही अपने पुश्तैनी गहनों का सबूत देना हो तो आपको चक्कर आ जाए.

यह भी तो हो सकता है कि किसी के पास पुश्तैनी गहने ठीक-ठाक हैं लेकिन वह अपनी स्थिति को सुधारने के लिए उन गहनों का इस्तेमाल नहीं करता हो, बल्कि वह उसे वह अपने पुरखों के निशानी के तौर पर रखना चाहता हो. फिर ऐसे में तो आप उसे गिरफ्तार कर लेंगे, क्योंकि आपके क़ानून के हिसाब से वह कालाधन रखने वाला धनकुबेर है.

चलते-चलते एक बार आपसे फिर कहूंगा कि आप प्लीज़ कालिदास मत बनिए.

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

सवाल एनकाउंटर पर क्यों, ISO 9001 प्रमाणित जेल की सुरक्षा पर क्यों नहीं?

बीते रविवार की देर रात भोपाल सेंट्रल जेल से इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) के 8 आतंकी गार्ड रमाशंकर यादव की हत्या करके फरार हो गए और 8 घंटे बाद पुलिस एनकाउंटर में मारे गए. आतंकियों के मारे जाने की ख़बर देश में आग की तरह फैल गई और पुलिस की तारीफ़ों के पुल बांधे जाने लगे

हालांकि कुछ ही देर में यही तारीफ़ें नफ़रत और फ़र्ज़ी में बदल गईं. देश के कई नेताओं ने सवाल उठाने शुरु कर दिए और सियासी घमासान का बिगुल फूंक दिया गया. पुलिस पर आरोप लगाए जाने लगे कि आतंकी सरेंडर करना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने मौक़ा देने के बजाय उन्हें मौत के घाट उतार दिया.



इस आरोप-प्रत्यारोप के दौर में असल सवाल को दरकिनार कर दिया, जिसका जवाब मिलना वाक़ई देश के लिए ज़रूरी था. सवाल था कि भोपाल का सेंट्रल जेल देश के सबसे सुरक्षित जेलों में से है. ऐसे जेल से आतंकी भागे कैसे? इसे देश में सबसे पहला आईएसओ 9001:2000 का प्रमाणपत्र भी मिला था. यह बात जेल की वेबसाईट पर साफ़ तौर पर लिखी भी गई है. अब सवाल यह है कि क्या यह प्रमाणपत्र वेबसाइट की शोभा बढ़ाने के लिए दिया गया था कि इतनी हाई सिक्योरिटी जेल से एक साथ 8 आतंकी आसानी से गार्ड की हत्या करके दीवार फांदकर फरार हो गए और किसी को भनक तक नहीं लगी.



वॉच टॉवर पर जिसकी ड्यूटी थी वह कहां था कि 32 फीट ऊँची दीवार (जिसपर जिन्दा तार लगे हैं) को फांदकर आतंकी भाग गए. गार्ड की हत्या हो गई, आतंकी फरार हो गए और जेल का अलार्म तक नहीं बजा. अब जिस जेल को देश के सबसे सुरक्षित जेल का प्रमाणपत्र हासिल है उसकी यह दशा है तो बाक़ी का क्या होगा यह आप भलीभाँती समझ गए होंगे.

कौंन है सिमी?
सिमी का पूरा नाम स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया है. इसका उदय 1977 अलीगढ़ मे हुआ. अमेरिकी राज्य इलिनोय के एक प्रोफ़ेसर मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीक़ी को इसका संस्थापक कहा जाता है. 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 अटैक के बाद भारत में इस संगठन पर पहला प्रतिबंध लगा दिया गया था. फिर दो बार भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित करने के अध्यादेश दिए. तब से यह संगठन भूमिगत कार्य करता है.

'साउथ एशियन टेररिज्म पोर्टल' के अनुसार शुरूआती दौर में इसे 'जमात-ए-इस्लामी' की छात्र इकाई के रूप में जाना जाता था लेकिन वर्ष 1981 में यह संगठन 'जमात-ए-इस्लामी' से अलग हो गया. सिमी का मुख्य उद्देश्य इस्लाम का प्रचार प्रसार करना है.

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

हिन्दी में दूसरी भाषा के शब्दों का प्रचलन क्या हिन्दी के लिए अभिशाप नहीं है ?

आज यानि 14 सितम्बर को हिन्दी पट्टी में हिन्दी दिवस की धूम है। कई जगह संगोष्ठी का भी आयोजन हुआ है जहाँ बड़े-बड़े साहित्यकार अपना जलवा दिखाएँगे। हर साल की तरह यह इस साल का भी हिन्दी दिवस संगोष्ठियों और आयोजनों के साथ ख़त्म हो जाएगा, लेकिन यह भी सोचना अनिवार्य है कि हिन्दी में जिस तरह अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा वह हिन्दी के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है?

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मेरे हिसाब से हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन, हिन्दी भाषा के लिए सर्वथा अभिशाप है। जैसा की सर्वविदित है कि हिन्दी भाषा का जन्म संस्कृत भाषा से हुआ है। संस्कृत सबसे पहले प्राकृत भाषा बनी, उसके बाद अपभ्रंश भाषा और फिर हिन्दी का जन्म हुआ।



किसी भी भाषा में किसी दूसरी भाषा के शब्दों का प्रचलन हमेशा अभिशाप ही होगा, आशीर्वाद क़तई नहीं हो सकता है। चाहे वह भाषा हिन्दी हो या फिर कोई अन्य भाषा ही क्यों न हो, क्योंकि जब किसी भाषा में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन बढ़ने लगता है तो उस मूल भाषा के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है। यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि आखिर मूल भाषा के शब्द कौन-से हैं और कौन-से नहीं। यही आज हिन्दी के साथ हो रहा है।

जिस प्रकार प्रत्येक भाषा की ख़ुद की एक अलग पहचान होती है, उसकी अपनी एक अलग प्रकृति होती है। ठीक उसी प्रकार हिन्दी की भी अपनी प्रकृति और एक अलग पहचान है, लेकिन जैसे ही इसमें अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग होने लगता है तो इसकी अपनी मूल प्रकृति नष्ट होने लगती है। आज हम अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग हिन्दी में इसके मूल रूप को एक किनारे पर रख कर रहे है। आज हमें अन्य भाषा के शब्दों को प्रयोग करने में सहुलियत महसूस हो रही है क्योंकि आज हमारे पास कम्प्यूटर है जिसकी वजह से इस पर टंकण (टाईप) करने में आसानी हो रही है।

हालांकि कुछ विद्वानों का मानना है कि इससे हिन्दी  का विकास होगा, यह और लोकप्रिय होगी, समृद्ध होगी और यह जन-जन की भाषा होगी, लेकिन यह भी सोचने का विषय है कि उस विकास से क्या फ़ायदा जिससे वह मूल वस्तु ही समाप्त हो जाए। ऐसा विकास नहीं चाहिए जिससे भाषा अपने मूल रंग को छोड़कर किसी अन्य रंग में इस क़दर रंग जाए कि अपनी पहचान ही खो बैठे। यदि यह विकास इसी प्रकार होता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं है जब हम कहने के लिए तो हिन्दी बोलेंगे, लेकिन शब्द हिन्दी की जगह किसी और भाषा के होंगे। जैसे हिन्दी सिनेमा में होता है। कहने के लिए तो वह ‘हिन्दी फीचर फिल्म’ होती है, जबकि उसका नाम ही वांटेड, रॉक-स्टार, अगली, स्टूडेंट-ऑफ-दी ईयर और सन ऑफ़ सरदार जैसा होता है।

हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग ठीक उसी प्रकार हो रहा है जिस प्रकार दूध में पानी का प्रयोग होता है। यहाँ एक बात ग़ौर करने वाली है कि पानी के प्रयोग से दूध की मात्रा तो बढ़ रही है (जैसा कि विद्वानों का मानना है) परंतु उसकी गुणवता हमेशा के लिए समाप्त हो रही है, जिसे वापस पाना मुमकिन नहीं है।

आज तो हम दूसरी भाषा के शब्दों पर इस प्रकार निर्भर हो गए हैं कि उसके बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता, क्योंकि हमने आज हिन्दी के उन मूल शब्दों को खो दिया है जिसके बदले में हम दूसरी भाषा के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। हम दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग में इस तरह व्यस्त हो गए कि हमें पता ही नहीं चला कि हिन्दी के मूल शब्द कब हमारी आँखों के सामने से ओझल हो गए, जिसका खामियाज़ा आज हिन्दी भाषा को भुगतना पड़ रहा है।

यदि हम थोड़ा सा हटकर सोचें कि आख़िर ऐसी क्या ज़रूरत पड़ गई कि हमें हिन्दी को लिखने-पढ़ने के लिए दूसरी भाषा के शब्दों का सहारा लेना पड़ा। इसका जवाब यह होगा कि कम्प्यूटर संचालन में सहुलियत के लिए या फिर भाषा का प्रयोग संक्षेप में करने के लिए, क्योंकि मनुष्य की यह प्रवृति होती है कि वह हमेशा किसी दूसरे आसान विकल्प की तलाश में रहता है और जैसे ही उसकी यह तलाश पूरी होती है वह अपना रुख़ नए विकल्प की ओर कर लेता है।

किसी भी युग में हमेशा से सामान्यतः दो भाषाओं की परम्परा रही है। पहली तो शिष्टजनों की भाषा तथा दूसरी आम-लोगों की भाषा। आज भी यह परम्परा पूरी तरह से कायम है। आज शिष्टजनों की भाषा हिंग्लिश (हिन्दी और अंग्रेज़ी का मिश्रण) है और आम-लोगों की भाषा हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, उड़िया या और कोई भी क्षेत्रिय भाषा हो सकती है।

वर्तमान समय में हिन्दी में यदि सबसे ज़्यादा किसी भाषा के शब्दों का प्रचलन बढ़ा है तो वह अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों का है। तक़रीबन तीन हज़ार अंग्रेज़ी के शब्द हिन्दी में आज इस क़दर घुल-मिल गए हैं जैसे वे शब्द हिन्दी के अपने ही खानदान के हों। जैसे- कमीज़ का शर्ट होना, बोतल का बॉटल होना, अपराध का क्राईम होना, तौलिया या अंगौछा का टॉवेल होना, हत्या का मर्डर होना, इत्यादि। ऐसे बहुत शब्द हिन्दी में आ गए हैं जिन्हें एक नज़र में चिन्हित करना मुश्किल है।

हिन्दी का मूल स्वरूप बिगाड़ने में सोशल मीडिया का भी अहम योगदान है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। इसने तो हिन्दी को हिंग्लिश और रोमन बना दिया है और यह काफ़ी हद तक सफल भी हो रहा है। जिस तरह संस्कृत से हिन्दी का उदय हुआ, ठीक उसी प्रकार हिन्दी से हिंग्लिश का उदय होता हुआ साफ-साफ नज़र आ रहा है, परंतु सवाल तो हिन्दी का है। दूसरी भाषा के शब्दों का हिन्दी में प्रचलन से हिन्दी का विकास तो हो रहा है, लेकिन हिन्दी का हिंग्लिश और रोमन होना इसका विकास नहीं अपितु यह हिन्दी का विनाश है।

कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि हिन्दी भाषा में किसी अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन कदापि उचित नहीं है और यह हमेशा हिन्दी के मूल अस्तित्व के लिए अभिशाप ही होगा, आशीर्वाद किसी भी सुरत में नहीं हो सकता है।

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

कहीं सुविधा ट्रेन न बन जाए आपकी दुविधा?



कहने को तो रेलवे ने गर्मी की छुट्टियों में यात्रियों की सुविधा के लिए ‘सुविधा’ नाम की ट्रेन की चलाई है, लेकिन यह वास्तव में दुविधा वाली ट्रेन है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि इसका टिकट लेने के बाद भी उन तमाम लोगों की तरह आप भी यही कहेंगे कि “काश मैंने प्लेन का ही टिकट लिया होता।” इस ट्रेन का किराया सामान्य किराए से लगभग तीन गुना ज़्यादा है। उदाहरण के तौर पर बात करें तो नई दिल्ली से छपरा का किराया सुविधा ट्रेन में आपको थ्री एसी का 3815 रुपया देना होगा, जबकि यदि आप यही थ्री एसी का टिकट बाक़ी किसी ट्रेन से लेते हैं तो 1300 रुपये के क़रीब आपको देना होगा। अब ऐसे में सवाल उठता है कि यह कैसी सुविधा है? और यदि ऐसी सुविधा किसी को लेनी होगी तो वह हवाई जहाज़ से जाएगा, क्यों प्रभु की रेल से जाएगा। यदि आप भी घर जाने से के लिए सुविधा से सोच रहे हैं, तो यह आपके लिए दुविधा हो सकती है।




आज के लिए इतना भी
फिर मिलेंगे चलते-चलते


रविवार, 27 मार्च 2016

मरने से पहले जाति बताना हुआ अनिवार्य!


जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा, आज से सरकार, तमाम राजनीतिक पार्टियों और मीडिया ने ऐलान किया है कि आप मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आपको स्वास्थ्य बीमा ना होने के बाद भी जातिगत वोट के ख़ातिर मुआवज़ा मिल सके और प्राइम टाइम में जगह दी जा सके। आज यह वाक्य इसलिए प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि हाल- फिलहाल के दिनों में जो कुछ घटनाएँ घटित हुईं हैं, चाहे वह दादरी कांड में अख़लाक की मौत पर राजनीति और मीडियानीति या फिर रोहित वेमुला वाली घटना ही क्यों न हो। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिस मीडिया और राजनीतिक पार्टियों ने इन सब घटनाओं को अंतर्राष्ट्रीय घटना बताया, वही आज डॉ. नारंग की हत्या पर ऐसी चुप्पी साधकर बैठी है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। वह इसलिए क्योंकि नारंग ने मरने से पहले अपनी जाति मुसलमान या दलित नहीं बताया। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि मौत भी जातिगत हो गई है, चाहे वह मौत आत्महत्या वाली ही क्यों न हो।
दादरी कांड की बात करें तो वहाँ सभी पार्टियों ने जमकर राजनीति खेली, जहाँ तक मेरी जानकारी है तो इस कांड में अख़लाक के परिजनों को क़रीब 45 लाख का मुआवज़ा दिया गया और ग्रेटर नोयडा में फ़्लैट भी दिया गया। हालाँकि यह बात अलग है कि अख़लाक के परिजन उस फ़्लैट में रह रहे हैं या नहीं या फिर देने वाला ही उस फ़्लैट को किराए पर दे दिया है। इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
मीडिया ने भी भरपूर कवरेज़ किया, प्राइम टाइम तो जैसे उसके लिए ही बिक गया था, 15-20 दिन तक जब भी कोई चैनल खोलो तो सिर्फ़ दादरी और अख़लाक ही दिखाई दे रहा था। उसके बाद रोहित वेमुला कांड हुआ जिसे लेकर फिर वही हुआ जो दादरी कांड में हुआ, वह सब इसलिए हुआ, क्योंकि रोहित को दलित घोषित किया गया, जबकि अख़लाक तो पहले से ही मुसलमान समुदाय का था जिसे वोट बैंक माना जाता रहा है। देश के कई दिग्गज़ नेता हैदराबाद पहुँचकर रोहित की जन्मकुंडली खंगालकर उसे दलित साबित करने में जुट गए, धरने पर बैठे और भी पता नहीं कौन-कौन से कर्म किए?
उसके बाद शहीद हनुमंथप्पा का मामला आया, वह जवान 8 दिन बर्फ में रहने के बाद इस दुनिया से रुख़सत हो गया, उसके लिए पूरे देश में दुआएँ मांगी गईं, लेकिन दुःख की बात की दुआएँ बेअसर साबित हुईं, लेकिन इस मामले में किसी राजनीतिक पार्टी ने न रुची दिखाई और न ही मीडिया ने, क्योंकि वहाँ पर न मुआवज़ा ज़रूरी था और न ही प्राइम टाइम में बहस।

कायदे से इसी घटना पर बहस होनी चाहिए, ताकि सैनिकों के लिए कोई बेहतर विकल्प निकाला जा सके और उन्हें आधुनिक सुविधाएँ मुहैया कराई जा सके, लेकिन वह नहीं हुआ, क्योंकि हनुमंथप्पा ने ख़ुद को मरने से पहले दलित या मुसलिम घोषित नहीं किया था। ऐसे में यह ज़रूरी है कि आप भी मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आप अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में अपनी जगह बना सकें और राजनीतिक स्वास्थ्य बीमा का लाभ ले सकें।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

रविवार, 13 मार्च 2016

नहीं सीखनी ऐसी आर्ट ऑफ लिविंग


ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखने की क्या ज़रुरत जिसे सीखने जाने का रास्ता सैकड़ो किसानों की बर्बाद हुई फ़सल से होकर जाती हो। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि जिस 30 फ़ीट चौड़े रास्ते से आज बीएमडबल्यू, फ़रारी या और भी महंगी गाड़ियों से लोग बाबा “डबल श्री” (श्री श्री 1 लाख 8 श्री कहना ज़्यादा उचित होगा) से जीने की कला सीखने जा रहे हैं, वह किसानों की उस लहलहाती फ़सलों को रौंदकर बनाई गई है जिसे उन्होंने अपना पेट पालने के लिए अपने पसीने से सिंचा था। बदले में उन्हें क्या मिला, इसका जवाब यह है कि उन्हें धमकाया तक भी गया, ताकि वे मुआवज़े की माँग न कर सकें। वाह रे! जीने की कला सीखाने वाले और सीखने वाले, साथ में मुकदर्शक बनी वह सरकार जो कल तक किसानों को फ़सल बीमा का चोला पहनाकर आगामी चुनाव की तैयारी कर रही थी और वह रे वित्तमंत्री साहब जिन्होंने बजट में किसानों को बड़े ही ख़ूबसूरत और कभी पूरे न होने वाले सपने दिखाए।



इस कार्यक्रम में पहुँचे ‘परिधान मंत्री’ के मुखार्विंद से निकली वे दो पंक्तियाँ भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होनी चाहिए जिसमें उऩ्होंने कहा, "हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होनी चाहिए, लेकिन यदि हम अपनी ही परंपरा और संस्कृति की ही बुराई करेंगे तो बाक़ी क्या कहेंगे। यह कला का कुंभ है।"
अब सवाल यह है ऐसे कला के कुंभ में डुबकी लगाने और ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखा कर भारत का सिर विश्वपटल पर ऊँचा करने की आवश्यकता ही क्या है? क्या ज़रूरत है दुनिया को दिखाने की कि हमारे पास श्री श्री रविशंकर जी महाराज जैसे महारथी हैं जो जीने की ऐसी कला सीखा रहे हैं जिसमें करोड़ो रुपये ख़र्च हो रहे हों।
अब इस कार्यक्रम की शुरूआत की बात करें तो शुरूआत में भी ड्रामा कम नहीं हुआ। जुर्माने को लेकर जो नौटंकी हुई उससे भी आप भली-भाँति वाक़िफ़ हैं, इसलिए ज़्यादा तह में जाने की दरकार नहीं है। लेकिन यह बताना वाक़ई आवश्यक है कि जो बाबा अपने महोत्सव में क़रीब 25.63 करोड़ रुपये ख़र्च कर रहे हैं, उनकी संस्था द्वारा 5 करोड़ जुर्माना देना वास्तव में बड़ी बात है। मेरे ख़्याल से तो जुर्माना लेना ही नहीं चाहिए, क्योंकि प्रकृति के नुक़सान की भरपाई जुर्माने से संभव नहीं है, चाहे जुर्माना कितना भी बड़ा ही क्यों न हो।
इतना सब जानने के बाद भी यदि उन अनुमानतः 35 लाख लोगों के साथ आप जीने की कला यानी आर्ट ऑफ़ लिविंग के कुंभ (मेरे ख़्याल से महाकुंभ) में डुबकी लगाने जा रहे हैं तो आपको मेरी ओर से अनंत शुभकामनाएँ, आपकी मनोरथें पूरी हों! आज मेगा शो का अंतिम दिन भी है।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

शनिवार, 12 मार्च 2016

दाढ़ी की ओर लौटते युवा

कुछ दिन पहले तक आपको या हमें जब भी ऑफ़िस जाना होता था या नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना होता था, किसी की शादी, ब्याह आदि में जाना होता था, तो इन तमाम जगहों पर जाने की तैयारी में सबसे पहली तैयारी हजामत यानी दाढ़ी कटवाने की होती थी। मतलब साफ़ था कि हमें चिकना दिखना है। वही आज के संदर्भ में बात करें तो इसके उलट हो रहा है। आज कही भी किसी भी कार्यक्रम में जाना होता है जहाँ स्पेशल दिखना ज़रूरी हो जाता है, वैसी स्थिति में आज भी हम सैलून की ओर रुख़ करते हैं, लेकिन दाढ़ी साफ़ करवाने के लिए नहीं, बल्कि ट्रीम यानी महीन, छोटी-छोटी करवाने के लिए।

थोड़ी स्टैंडर्ड भाषा में कहें तो इस दाढ़ी कटवाने की प्रकिया को आजकल सेट करवाना कहा जा रहा है। इसका क्रेज़ इतना बढ़ता जा रहा है कि दाढ़ी उगाने के लिए कुछ दवाएँ और क्रीमों का इस्तेमाल करने से भी नहीं कतरा रहे हैं। इसके लिए बीयर्ड जैसे तमाम प्रोडक्ट भी बाज़ार में आ गए हैं जो दाढ़ी उगाने में युवाओं की मदद कर रहे हैं। इसमें सबसे आगे उस्तरा नामक कंपनी है जो Mooch & Beard Tonic नाम से अपना प्रोडक्ट बेच रही है।


 



 यह तस्वीरें उन चंद लोगों की हैं जो आजकल ऐसी क्रीमों का सहारा ले रहे हैं।





कुछ दिन पहले  की बात करें तो जब रणवीर सिंह अभिनीत बाजीराव मस्तानी रिलीज़ हुई थी उस समय भी हरदम चिकने रहने वाले युवाओं को लम्बी और घनी मूँछों में देखा गया था। तो कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ज़माना फिर से वहीं जा रहा है जहाँ से शुरू हुआ था।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

भूख

भूख क्या होती है? इसे जानने के लिए किसी पुख़्ता प्रमाण की ज़रूरत नहीं है, यह अपने आप में एक पुख़्ता प्रमाण है। इससे वे सभी जीव वाकिफ़ है जिनमें प्राण है। चाहे वह इंसान हो, हैवान हो, शैतान हो, या फिर भगवान ही क्यों न हो। यह एक ऐसी बला है जो प्रत्येक जीव को सताती है।
 

आज भी पुरी दुनिया में खाना खाने से मरने वालों की संख्या, भूख से मरने वालों की संख्या से कम ही है। थोड़ी देर के लिए यदि सोचा जाए कि भगवान ने सभी जीवों को वगैर पेट का धरती पर भेजा होता तो क्या होता। मेरे ख़्याल से कुछ भी नहीं होता और कुछ होता भी तो वह विनाशकारी होता। सबलोग केवल मौज-मस्ती ही करते। ना कोई किसी का नौकर होता ना ही कोई किसी का मालिक होता, क्योंकी भूख तभी लगेगी जब जीव के पास पेट होगा। ये भूख ही तो जो सबको अपनी ऊँगलियों पर नचाती है वरना किसी को क्या पड़ी है जो किसी के यहाँ जा कर नौकरी करे और दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करे। कोई ज़्यादा खाने से मर रहा है, तो किसी को खाना नसीब ही नहीं हो रहा है।
 
जब भूख से किसी की मौत होती है तो मीडिया के लिए एक पाँच मिनट की कवरेज़ होती है, सरकार एक दिन दुःख के सिवाय कुछ भी व्यक्त नहीं करती है, फ़िल्मकारों को फ़िल्म बनाने का आइडिया मिलता है। यहाँ उस भूखे आदमी को खाना के अलावा सबको अपने काम का कुछ-ना-कुछ मिल ही जाता है। हद तो तब हो जाती है जब उससे यह पूछा जाता है कि आपने चार दिन से खाना नहीं खाया, आपको कैसा लग रहा है? यही सवाल उसे खाना देकर भी पूछा जा सकता है कि आपने चार दिन बाद खाना खाया, अब आप कैसा महसूस कर रहे है।


वैसे भूख को मिटाया तो नहीं जा सकता है लेकिन इससे होने वाली मौत को रोका जा सकता है। सऊदी अरब में एक ऐसा शहर है जहाँ अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर फ़्रिज़ रखा गया है जिसमें लोग अपने घर का बचा खाना रख जाते है फिर जिसे ज़रूरत होती है वह उस खाना को ले जाता है। कुछ दिन पहले ज़िंदगी नाम के एक मनोरंजन चैनल पर एक सीरियल प्रसारित हो रहा है “काश मैं आपकी बेटी होती” इस सीरियल के एक एपिसोड में एक दृस्य में एक ग़रीब माँ अपने बच्चों से यह प्रार्थना कर रही है कि आज की रात उन्हें भूख सहनी होगी, क्योंकी घर में सिर्फ़ एक मुठ्ठी चावल है जो दिन भर मेहनत करने के बाद आने वाले उन बच्चों के पिता को दिया जाने वाला है और बच्चों को यह अभिनय करना है कि उन्होंने पहले ही खाना खा लिया है। पिता के लौटने पर बच्चों ने अविश्वसनीय अभिनय किया। परंतु निवाला लेते समय सहज ही छोटे बच्चे का मुँह निवाला की उम्मीद से खुला जैसा की पहले से होता आया है। पिता को यह समझने में देर नहीं लगी किसी ने नहीं खाया है। सब केवल नाटक कर रहे है। पिता ने कहा थोड़ा ही सही, लेकिन सब लोग खायेंगे। भूख को सब लोग बाँटकर सहेंगे।


सदियों से एक परंपरा चली आ रही है कि ख़ुदा-ना-ख़ास्ता किसी के घर मौत हो जाती है तो दो-तीन दिन तक घर का चुल्हा नहीं जलाया जाता है, बल्कि पड़ोसी के घर से खाना आता है। इसी परंपरा से जुड़ी एक कहानी है जिसमें एक गरीब परिवार में चार सदस्य है। माता,पिता, लड़का और लड़की। एक दिन उस लड़के कि अचानक तबीयत ख़राब हो जाती है और वह लड़का ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा होता है। ये बात जब उसकी बहन को पता चलता है तो वह अपने पापा से पुछती है कि पापा भैया कब मरेगा। उस छोटी सी बच्ची को तो यह भी नहीं मालूम कि मौत क्या होती है, लेकिन उसे यह मालूम है कि भूख क्या होती है और खाना क्या होता है। उसे यह मालूम है कि भैया के मरने पर पड़ोसी के घर से स्वादिष्ट खाना आएगा। उसकी छोटी सी स्मृति में दादी की मौत पर पड़ोसी के घर से आया खाना हिलोरे मार रहा है। वह भूख को जानती है। उसी खिलौने से तो खेल कर वह बड़ी हुई है। ऐसी बहुत कहानियाँ हैं जो आपको ऐसे निचोड़ देगी, जैसे धोबी धोबी-घाट पर कपड़े को निचोड़ता है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पहली नौकरी और पहला प्यार


ये दोनों ज़िन्दगी के ऐसे पड़ाव हैं जिससे हर एक इंसान को गुज़रना पड़ता है। आपको भी गुज़रना पड़ा ही होगा। इन दोनों को अगर जुड़वा भाई भी कहा जाए तो शायद ग़लत नहीं होगा, क्योंकि दोनों में काफ़ी समानताएँ हैं जो इन्हें आपस में जोड़ती हैं। हालाँकि कभी दरार आने के बाद आप चाहकर भी इन दोनों को आजीवन भूल नहीं पाते हैं।

नोट- दरार का आना तय है, मायूस न हो!

आपकी पहली नौकरी हो या पहला प्यार, इन दोनों से आपको बेहद ही प्यार होता है या यूँ कहें तो बहुत ही लगाव होता है। प्यार की स्थिति में आप हर वक़्त एक झलक पाने मात्र को बेकरार रहते हैं और नौकरी की स्थिति में रोज़ कुछ नया करके बॉस को ख़ुश रखने की जुगत में लगे रहते हैं। आप किसी भी क़ीमत पर इन दोनों को खोना नहीं चाहते और आपकी कोशिश हर-समय अपना शत्-प्रतिशत देने की होती है। आप हर वक़्त यही सोचते रहते हैं कि एक ओर आपके दफ़्तर वाले ख़ुश रहे और दूसरी ओर आपकी मेहबूबा भी किसी बात को लेकर नाराज़ न हो। आपको भी कभी-न-कभी इसका आभास तो हुआ ही होगा और यदि नहीं हुआ होगा तो आगे हो जाएगा, परेशान होने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।


बात वहाँ तक ठीक-ठाक रहती है जब तक आप उन्हें ख़ुश रखने के हर-संभव प्रयास करते हैं, बाबू, बेबी, सोना-मोना, डार्लिंग आदि से संबोधित करते हैं, तीनों समय पूछते हैं कि मेरा बाबू खाना खाया की नहीं, भले ही आपके पेट में हाथी सुसाइड कर रहे हों, लेकिन बाबू को तो पूछना ही पड़ेगा। स्थिति तब विपरीत हो जाती है जब आप किसी एक की बात को किसी दिन नकार देते हैं।
जैसे - भले ही आप रोज़ अपने पहले प्यार के साथ किसी रेस्टोरेंट, किसी होटल या कहीं भी उसके कहने मात्र पर मूड न होने के बावजूद भी चलने को तैयार हो जाते हैं, उसके मुँह लटकाने मात्र पर आप पिज्ज़ा ऑर्डर कर देते हैं, मैडम के साथ नाक-मुँह दबाकर गोलगप्पे खाते हैं, टेबलेट खाकर काम करते हैं, ओवर टाइम (विदआउट...) भी करते हैं, अपना सर्वश्रेष्ठ देने के चक्कर में घड़ी हाथ पर बँधी होने के बाद भी कभी नज़र नहीं डालते हैं, (ख़ासकर ऑफ़िस से वापस आते समय)। हालाँकि जाते समय तो नज़र का रहना बेहद ही ज़रूरी है, नहीं तो क्वार्टर लग जाएगा। घर-परिवार से सप्ताह में एक बार बात करते हैं, वह भी तब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, जब आपके पास वॉट्सऍप, फ़ेसबुक, हैंगआउट, स्काईप, इत्यादि से वीडियो कॉलिंग करने की सुविधा से लैस स्मार्टफ़ोन हो। लेकिन जैसे भी आपने इन सब शुभ कार्यों से इतर अपने लिए 24 घण्टे टिक-टिक करती उस घड़ी पर नज़र डालते हैं जो आपकी कलाई पर बँधी है, तो भाई साहब आप गए काम से।
अब बारी आती है किसी एक से बिछड़ने की या दूसरे शब्दों में उससे कहीं दूर जाने की। यह स्थिति सबसे भयावह और ख़तरनाक होती है, क्योंकि इस समय इन दोनों को पाने के लिए आप अर्श से फर्श पर भी आना पसंद करते हैं और चाहकर भी ज़िन्दगी भर दोनों को भूल नहीं पाते। यदि आप ग़ौर से देखें तो इन दोनों के चक्कर में ही आपकी ज़िन्दगी गुज़र जाती है। आधा जीवन प्यार और आधा जीवन नौकरी। आज के लिए इतना ही...............


फिर मिलेंगे चलते-चलते

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

नई पीढ़ी को नया तजुर्बा दे गया दिल्ली पुस्तक मेला!

नई दिल्ली में 44वें विश्व पुस्तक मेले का सफल आयोजन 9 से 17 जनवरी 2016 के बीच किया गया। इस मेले में सैकड़ों किताबों का विमोचन किया गया। कई बड़े पत्रकारों ने इस मेले में शिरकत की, वहीं मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन और नरेन्द्र कोहली जैसी हस्तियाँ भी पहुँची। अब आते हैं असली मुद्दे पर इस मेले का आयोजन तब हुआ जब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, जब देश में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या (2015) 243,198,922 है, जब लगभग सभी युवाओं के पास स्मार्टफ़ोन है, जब कभी किताब की ओर पलट कर भी ना देखने वाला युवा स्मार्टफ़ोन में ई-बुक पढ़कर काम चला ले रहा है, वॉट्सऍप पर बड़ा-बड़ा चिट्ठा पढ़ रहा है। 
अब सवाल यह उठता है कि आज का वह वर्ग जो ऑनलाइन 50-60% की छूट पर ख़रीदारी कर रहा है, वह इतनी संख्या में 10 प्रतिशत की छूट पर ख़रीदारी करने क्यों गया? आपको बता दें कि इस बार के मेले में क़रीब 12 लाख लोग पहुँचे थे। इस भीड़ ने उस मिथक को तोड़ दिया कि भारत में लोग किताब नहीं पढ़ते और यहाँ पाठकों की संख्या कम हो रही है। पाठकों की संख्या का अनुमान आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि एचबीजी (अमेरिकी प्रकाशन) के अरविंद बताते हैं कि पहले दिन ही 3.5 लाख के बिक्री हुई, जो पिछले साल 2 लाख की थी। मतलब साफ़ है कि युवा पढ़ तो रहा है, उसके अंदर पढ़ने की ललक पहले से ज़्यादा हो रही है, भले ही यह ललक फ़ेसबुक या वॉट्सऍप पर पढ़कर ही क्यों न जगी हो, लेकिन जगी तो ज़रूर है। इसमें कोई शक नहीं है। वैसे इस मेले में भीड़ का होना इसलिए भी ज़रूरी था, क्योंकि इस पुस्तक मेले का मुख्य अतिथि चीन था जिसने सबसे पहले छपाई को जन्म दिया था और हमारे यहाँ अतिथि तो देवता होता है (अतिथि देवो भवः), फिर स्वागत करना तो बनता ही है।
अब बात आती है हिन्दी की, तो आपको बता दें ज़माना अब हिन्दी का ही आ रहा है, क्योंकि हिन्दी के किताब के स्टालों पर क़रीब 1 किलोमीटर लंबी लाईन लगी थी जो कि अंग्रज़ी को मुँह चिढ़ाने जैसी थी। वैसे मेले में प्रकाशकों की बात करें तो उन सबने किताबों की ऊँची दामों से पाठकों को ठेस तो ज़रूर पहुँचाया। यदि आपको थोड़ा-सा अर्थशास्त्र का ख़्याल आ रहा हो तो आपने ज़रूर पढ़ा होगा कि जब किसी वस्तु की मांग बाज़ार में कम हो जाती है तो उसका दाम भी कम हो जाता है, लेकिन यहाँ तो इसके विपरित हुआ। अब कुछ वरिष्ठजन जो यह कहते हैं कि ऑनलाइन के ज़माने में लोग किताबें नहीं पढ़ रहे, तो अब यह उनका कहना सरासर अन्याय होगा, क्योंकि नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2016 में यह झूठा साबित हो गया, क्योंकि यदि लोग नहीं पढ़ते तो किताबें सस्ती होती, न की महंगी। कुल मिलाकर यह तो कहा ही जा सकता है कि यह मेला युवाओं को एक नया तजुर्बा तो देकर गया ही।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते 

बुधवार, 13 जनवरी 2016

पलक की गिरफ़्तारी और कठघरे में खड़े हास्य कलाकार

क्या अब इस देश में कॉमेडी करना, किसी की नक़ल उतारना, किसी से मजा़क करना भी गुनाह होता जा रहा है? क्या इससे पहले किसी हास्य कलाकार ने किसी बाबा, किसी अभिनेता या नेता की नक़ल नहीं की ? यह सवाल सिर्फ़ मेरे ही ज़ेहन में नहीं, बल्कि देश के तमाम लोगों के ज़ेहन में तब से उठ रहे हैं जब से 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' की पलक उर्फ़ कीकू शारदा की गिरफ़्तारी हुई है।


बाबाओं से अभी तक तो केवल आम जनता ही परेशान थी, लेकिन पलक की गिरफ़्तारी इस बात की ओर संकेत करती है कि बाबा लोग केवल लोगों को चूना ही नहीं लगा सकते, बल्कि किसी को जेल भी भिजवा सकते हैं, चाहे वह कोई हास्य कलाकार ही क्यों न हो। हैरानी वाली बात तो यह है कि हास्य कलाकार द्वारा माफ़ी मांगने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा गया, जबकि उसे माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए, क्योंकि हास्य कलाकार ही जब मांफ़ी मांगने लगेगा तो फिर बच ही क्या जाएगा? यदि कीकू की गिरफ़्तारी जायज़ है तो फिर तमाम एफ़एम चैनल के आरजे (रिडियो जॉकी, एंकर) को भी अरेस्ट किया जाए, क्योंकि उनसे ज़्यादा भद्दा मज़ाक शायद ही कोई करता होगा। कॉमेडी फ़िल्मों पर, तमाम कॉमेडी शोज पर भी रोक लगाई जाए, धारावाहिकों पर भी रोक लगाई जाए, क्योंकि उसमें भी कभी सास की छवि, तो कभी बहू की छवि को नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है।

आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते!

रविवार, 10 जनवरी 2016

आख़िर क्या बला है 'वायरल' ?

'वायरल' शब्द का नाम तो आपने सुना ही होगा। वैसे आप जो वायरल समझ रहे हैं, मैं उस वायरल की बात नहीं कर रहा हूँ। आप शायद उस वायरल के बारे में सोच रहे हैं जब डॉक्टर कहता है कि आपको बदलते मौसम के कारण सर्दी या बुख़ार हो गया है जो कि वायरल है।


वायरल: वायरल वह बला है जब चंद मिनटों में कोई ख़बर, फ़ोटो, वीडियो या गाना इण्टरनेट पर बहुत सारे लोगों द्वारा देखा, पढ़ा या सुना जाए। इसका जन्म इण्टरनेट के पादूर्भाव और स्मार्टफ़ोन  के आने के बाद हुआ है जो आज किसी भी समय अपनी ओर लोगों का ध्यान खिंचने में समर्थ है।

अब चलिए बता ही देता हूँ, मैं उस वायरल की बात कर रहा हूँ जो आजकल अक़्सर आपको फ़ेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, वॉट्सऍप पर देखने, पढ़ने और सुनने को मिल रहा है। आजकल यह ऐसा शब्द हो गया है जिसे सुनते ही सबके कान खड़े हो जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, आप किसी को एक वीडियों दिखाइये तो वह एक बार में शायद ही देखेगा, लेकिन यदि आपने यह कह दिया है, "यार यह वीडियो देख ना, वायरल हो गयी है।" वह आदमी बिना किसी झिझक के पलटकर देखेगा। यह तो हो गई सोशल मीडिया और आम जनता की बात, अब आते हैं वास्तविक मीडिया में।
यदि आपने दुर्भाग्यवश आज की पत्रकारिता में आने का मन बना लिया है तो आपको इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि आप ऐसी ही ख़बरें लिखें जो तुरंत वायरल हो जाए, नहीं तो भाई साहब आप पत्रकारिता को तो भूल ही जाइए, क्योंकि आपको नौकरी तो मिलने वाली है नहीं। आलम तो यह है कि मीडिया घरानों में साक्षात्कार के समय भी पूछा जाने लगा है कि आपने स्कूप-हूप (scoopwhoop) या गजब पोस्ट (Gajabpost) ( इन दोनों वेबसाइटों पर वायरल ख़बरें ही मिलतीं हैं) देखी है? यदि आपका जवाब हाँ है तो सैलरी की बात होगी और यदि जवाब नहीं हुआ तो भाई साहब आप बिना कुछ कहे चुपचाप अपना तीन पन्ने वाला रिज्यूमे लेकर वापस आ जाएँ, यही बेहतर होगा।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते!

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

ब्लॉग का नाम चलते-चलते ही क्यों?

सबसे पहले तो आप सभी का “चलते-चलते” ब्लॉग पर स्वागत है। अब आपके ज़ेहन में एक सवाल उठ रहा होगा कि आख़िर इस ब्लॉग का नाम “चलते-चलते” ही क्यों? 

इसके दो कारण हैं -

  1. पहला -- कई दफ़ा ऐसा होता है कि आप कहीं की यात्रा पर होते हैं या फिर किसी से कम समय में जल्दी-जल्दी अपनी बात पूरी करते हैं, लेकिन इस मर्तबाँ कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं या कोई ऐसी बात हो जाती है जो आपके ज़ेहन में कई दिनों तक घूमती है।
  2. दूसरा -- आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में आपके और मेरे पास महंगी घड़ी तो है, लेकिन न आपके पास समय है और न ही मेरे पास। हालाँकि कुछ आपको भी कहना है और मुझे सुनना है और कभी मुझे कहना है आपको सुनना है। इंसान हैं तो बात-चीत तो होगी ही, बस कमी है तो समय की।
अब आप समझ ही गए होंगे कि “चलते-चलते” नाम मैंने क्यों रखा है? अब आपको इस ब्लॉग की ख़ासियत के बारे में भी बता दें। यहाँ आपको थोड़ा-सा अटपटा महसूस हो सकता है, क्योंकि यहाँ मैं वहीं हिन्दी लिखूँगा जो वास्तव में होती है। बाक़ी आप पढ़ेंगे तो आपको ख़ुद-ब-ख़ुद महसूस होगा। हाँ, पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा, क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया ही वह पत्थर है जिस पर मैं ख़ुद को रगड़कर आपके क़ाबिल बनाउँगा।
धन्यवाद!
फिर मिलेंगे ‘चलते-चलते’

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्...