मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

भूख

भूख क्या होती है? इसे जानने के लिए किसी पुख़्ता प्रमाण की ज़रूरत नहीं है, यह अपने आप में एक पुख़्ता प्रमाण है। इससे वे सभी जीव वाकिफ़ है जिनमें प्राण है। चाहे वह इंसान हो, हैवान हो, शैतान हो, या फिर भगवान ही क्यों न हो। यह एक ऐसी बला है जो प्रत्येक जीव को सताती है।
 

आज भी पुरी दुनिया में खाना खाने से मरने वालों की संख्या, भूख से मरने वालों की संख्या से कम ही है। थोड़ी देर के लिए यदि सोचा जाए कि भगवान ने सभी जीवों को वगैर पेट का धरती पर भेजा होता तो क्या होता। मेरे ख़्याल से कुछ भी नहीं होता और कुछ होता भी तो वह विनाशकारी होता। सबलोग केवल मौज-मस्ती ही करते। ना कोई किसी का नौकर होता ना ही कोई किसी का मालिक होता, क्योंकी भूख तभी लगेगी जब जीव के पास पेट होगा। ये भूख ही तो जो सबको अपनी ऊँगलियों पर नचाती है वरना किसी को क्या पड़ी है जो किसी के यहाँ जा कर नौकरी करे और दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करे। कोई ज़्यादा खाने से मर रहा है, तो किसी को खाना नसीब ही नहीं हो रहा है।
 
जब भूख से किसी की मौत होती है तो मीडिया के लिए एक पाँच मिनट की कवरेज़ होती है, सरकार एक दिन दुःख के सिवाय कुछ भी व्यक्त नहीं करती है, फ़िल्मकारों को फ़िल्म बनाने का आइडिया मिलता है। यहाँ उस भूखे आदमी को खाना के अलावा सबको अपने काम का कुछ-ना-कुछ मिल ही जाता है। हद तो तब हो जाती है जब उससे यह पूछा जाता है कि आपने चार दिन से खाना नहीं खाया, आपको कैसा लग रहा है? यही सवाल उसे खाना देकर भी पूछा जा सकता है कि आपने चार दिन बाद खाना खाया, अब आप कैसा महसूस कर रहे है।


वैसे भूख को मिटाया तो नहीं जा सकता है लेकिन इससे होने वाली मौत को रोका जा सकता है। सऊदी अरब में एक ऐसा शहर है जहाँ अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर फ़्रिज़ रखा गया है जिसमें लोग अपने घर का बचा खाना रख जाते है फिर जिसे ज़रूरत होती है वह उस खाना को ले जाता है। कुछ दिन पहले ज़िंदगी नाम के एक मनोरंजन चैनल पर एक सीरियल प्रसारित हो रहा है “काश मैं आपकी बेटी होती” इस सीरियल के एक एपिसोड में एक दृस्य में एक ग़रीब माँ अपने बच्चों से यह प्रार्थना कर रही है कि आज की रात उन्हें भूख सहनी होगी, क्योंकी घर में सिर्फ़ एक मुठ्ठी चावल है जो दिन भर मेहनत करने के बाद आने वाले उन बच्चों के पिता को दिया जाने वाला है और बच्चों को यह अभिनय करना है कि उन्होंने पहले ही खाना खा लिया है। पिता के लौटने पर बच्चों ने अविश्वसनीय अभिनय किया। परंतु निवाला लेते समय सहज ही छोटे बच्चे का मुँह निवाला की उम्मीद से खुला जैसा की पहले से होता आया है। पिता को यह समझने में देर नहीं लगी किसी ने नहीं खाया है। सब केवल नाटक कर रहे है। पिता ने कहा थोड़ा ही सही, लेकिन सब लोग खायेंगे। भूख को सब लोग बाँटकर सहेंगे।


सदियों से एक परंपरा चली आ रही है कि ख़ुदा-ना-ख़ास्ता किसी के घर मौत हो जाती है तो दो-तीन दिन तक घर का चुल्हा नहीं जलाया जाता है, बल्कि पड़ोसी के घर से खाना आता है। इसी परंपरा से जुड़ी एक कहानी है जिसमें एक गरीब परिवार में चार सदस्य है। माता,पिता, लड़का और लड़की। एक दिन उस लड़के कि अचानक तबीयत ख़राब हो जाती है और वह लड़का ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा होता है। ये बात जब उसकी बहन को पता चलता है तो वह अपने पापा से पुछती है कि पापा भैया कब मरेगा। उस छोटी सी बच्ची को तो यह भी नहीं मालूम कि मौत क्या होती है, लेकिन उसे यह मालूम है कि भूख क्या होती है और खाना क्या होता है। उसे यह मालूम है कि भैया के मरने पर पड़ोसी के घर से स्वादिष्ट खाना आएगा। उसकी छोटी सी स्मृति में दादी की मौत पर पड़ोसी के घर से आया खाना हिलोरे मार रहा है। वह भूख को जानती है। उसी खिलौने से तो खेल कर वह बड़ी हुई है। ऐसी बहुत कहानियाँ हैं जो आपको ऐसे निचोड़ देगी, जैसे धोबी धोबी-घाट पर कपड़े को निचोड़ता है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पहली नौकरी और पहला प्यार


ये दोनों ज़िन्दगी के ऐसे पड़ाव हैं जिससे हर एक इंसान को गुज़रना पड़ता है। आपको भी गुज़रना पड़ा ही होगा। इन दोनों को अगर जुड़वा भाई भी कहा जाए तो शायद ग़लत नहीं होगा, क्योंकि दोनों में काफ़ी समानताएँ हैं जो इन्हें आपस में जोड़ती हैं। हालाँकि कभी दरार आने के बाद आप चाहकर भी इन दोनों को आजीवन भूल नहीं पाते हैं।

नोट- दरार का आना तय है, मायूस न हो!

आपकी पहली नौकरी हो या पहला प्यार, इन दोनों से आपको बेहद ही प्यार होता है या यूँ कहें तो बहुत ही लगाव होता है। प्यार की स्थिति में आप हर वक़्त एक झलक पाने मात्र को बेकरार रहते हैं और नौकरी की स्थिति में रोज़ कुछ नया करके बॉस को ख़ुश रखने की जुगत में लगे रहते हैं। आप किसी भी क़ीमत पर इन दोनों को खोना नहीं चाहते और आपकी कोशिश हर-समय अपना शत्-प्रतिशत देने की होती है। आप हर वक़्त यही सोचते रहते हैं कि एक ओर आपके दफ़्तर वाले ख़ुश रहे और दूसरी ओर आपकी मेहबूबा भी किसी बात को लेकर नाराज़ न हो। आपको भी कभी-न-कभी इसका आभास तो हुआ ही होगा और यदि नहीं हुआ होगा तो आगे हो जाएगा, परेशान होने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है।


बात वहाँ तक ठीक-ठाक रहती है जब तक आप उन्हें ख़ुश रखने के हर-संभव प्रयास करते हैं, बाबू, बेबी, सोना-मोना, डार्लिंग आदि से संबोधित करते हैं, तीनों समय पूछते हैं कि मेरा बाबू खाना खाया की नहीं, भले ही आपके पेट में हाथी सुसाइड कर रहे हों, लेकिन बाबू को तो पूछना ही पड़ेगा। स्थिति तब विपरीत हो जाती है जब आप किसी एक की बात को किसी दिन नकार देते हैं।
जैसे - भले ही आप रोज़ अपने पहले प्यार के साथ किसी रेस्टोरेंट, किसी होटल या कहीं भी उसके कहने मात्र पर मूड न होने के बावजूद भी चलने को तैयार हो जाते हैं, उसके मुँह लटकाने मात्र पर आप पिज्ज़ा ऑर्डर कर देते हैं, मैडम के साथ नाक-मुँह दबाकर गोलगप्पे खाते हैं, टेबलेट खाकर काम करते हैं, ओवर टाइम (विदआउट...) भी करते हैं, अपना सर्वश्रेष्ठ देने के चक्कर में घड़ी हाथ पर बँधी होने के बाद भी कभी नज़र नहीं डालते हैं, (ख़ासकर ऑफ़िस से वापस आते समय)। हालाँकि जाते समय तो नज़र का रहना बेहद ही ज़रूरी है, नहीं तो क्वार्टर लग जाएगा। घर-परिवार से सप्ताह में एक बार बात करते हैं, वह भी तब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, जब आपके पास वॉट्सऍप, फ़ेसबुक, हैंगआउट, स्काईप, इत्यादि से वीडियो कॉलिंग करने की सुविधा से लैस स्मार्टफ़ोन हो। लेकिन जैसे भी आपने इन सब शुभ कार्यों से इतर अपने लिए 24 घण्टे टिक-टिक करती उस घड़ी पर नज़र डालते हैं जो आपकी कलाई पर बँधी है, तो भाई साहब आप गए काम से।
अब बारी आती है किसी एक से बिछड़ने की या दूसरे शब्दों में उससे कहीं दूर जाने की। यह स्थिति सबसे भयावह और ख़तरनाक होती है, क्योंकि इस समय इन दोनों को पाने के लिए आप अर्श से फर्श पर भी आना पसंद करते हैं और चाहकर भी ज़िन्दगी भर दोनों को भूल नहीं पाते। यदि आप ग़ौर से देखें तो इन दोनों के चक्कर में ही आपकी ज़िन्दगी गुज़र जाती है। आधा जीवन प्यार और आधा जीवन नौकरी। आज के लिए इतना ही...............


फिर मिलेंगे चलते-चलते

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

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