रविवार, 27 मार्च 2016

मरने से पहले जाति बताना हुआ अनिवार्य!


जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा, आज से सरकार, तमाम राजनीतिक पार्टियों और मीडिया ने ऐलान किया है कि आप मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आपको स्वास्थ्य बीमा ना होने के बाद भी जातिगत वोट के ख़ातिर मुआवज़ा मिल सके और प्राइम टाइम में जगह दी जा सके। आज यह वाक्य इसलिए प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि हाल- फिलहाल के दिनों में जो कुछ घटनाएँ घटित हुईं हैं, चाहे वह दादरी कांड में अख़लाक की मौत पर राजनीति और मीडियानीति या फिर रोहित वेमुला वाली घटना ही क्यों न हो। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिस मीडिया और राजनीतिक पार्टियों ने इन सब घटनाओं को अंतर्राष्ट्रीय घटना बताया, वही आज डॉ. नारंग की हत्या पर ऐसी चुप्पी साधकर बैठी है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। वह इसलिए क्योंकि नारंग ने मरने से पहले अपनी जाति मुसलमान या दलित नहीं बताया। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि मौत भी जातिगत हो गई है, चाहे वह मौत आत्महत्या वाली ही क्यों न हो।
दादरी कांड की बात करें तो वहाँ सभी पार्टियों ने जमकर राजनीति खेली, जहाँ तक मेरी जानकारी है तो इस कांड में अख़लाक के परिजनों को क़रीब 45 लाख का मुआवज़ा दिया गया और ग्रेटर नोयडा में फ़्लैट भी दिया गया। हालाँकि यह बात अलग है कि अख़लाक के परिजन उस फ़्लैट में रह रहे हैं या नहीं या फिर देने वाला ही उस फ़्लैट को किराए पर दे दिया है। इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
मीडिया ने भी भरपूर कवरेज़ किया, प्राइम टाइम तो जैसे उसके लिए ही बिक गया था, 15-20 दिन तक जब भी कोई चैनल खोलो तो सिर्फ़ दादरी और अख़लाक ही दिखाई दे रहा था। उसके बाद रोहित वेमुला कांड हुआ जिसे लेकर फिर वही हुआ जो दादरी कांड में हुआ, वह सब इसलिए हुआ, क्योंकि रोहित को दलित घोषित किया गया, जबकि अख़लाक तो पहले से ही मुसलमान समुदाय का था जिसे वोट बैंक माना जाता रहा है। देश के कई दिग्गज़ नेता हैदराबाद पहुँचकर रोहित की जन्मकुंडली खंगालकर उसे दलित साबित करने में जुट गए, धरने पर बैठे और भी पता नहीं कौन-कौन से कर्म किए?
उसके बाद शहीद हनुमंथप्पा का मामला आया, वह जवान 8 दिन बर्फ में रहने के बाद इस दुनिया से रुख़सत हो गया, उसके लिए पूरे देश में दुआएँ मांगी गईं, लेकिन दुःख की बात की दुआएँ बेअसर साबित हुईं, लेकिन इस मामले में किसी राजनीतिक पार्टी ने न रुची दिखाई और न ही मीडिया ने, क्योंकि वहाँ पर न मुआवज़ा ज़रूरी था और न ही प्राइम टाइम में बहस।

कायदे से इसी घटना पर बहस होनी चाहिए, ताकि सैनिकों के लिए कोई बेहतर विकल्प निकाला जा सके और उन्हें आधुनिक सुविधाएँ मुहैया कराई जा सके, लेकिन वह नहीं हुआ, क्योंकि हनुमंथप्पा ने ख़ुद को मरने से पहले दलित या मुसलिम घोषित नहीं किया था। ऐसे में यह ज़रूरी है कि आप भी मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आप अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में अपनी जगह बना सकें और राजनीतिक स्वास्थ्य बीमा का लाभ ले सकें।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

रविवार, 13 मार्च 2016

नहीं सीखनी ऐसी आर्ट ऑफ लिविंग


ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखने की क्या ज़रुरत जिसे सीखने जाने का रास्ता सैकड़ो किसानों की बर्बाद हुई फ़सल से होकर जाती हो। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि जिस 30 फ़ीट चौड़े रास्ते से आज बीएमडबल्यू, फ़रारी या और भी महंगी गाड़ियों से लोग बाबा “डबल श्री” (श्री श्री 1 लाख 8 श्री कहना ज़्यादा उचित होगा) से जीने की कला सीखने जा रहे हैं, वह किसानों की उस लहलहाती फ़सलों को रौंदकर बनाई गई है जिसे उन्होंने अपना पेट पालने के लिए अपने पसीने से सिंचा था। बदले में उन्हें क्या मिला, इसका जवाब यह है कि उन्हें धमकाया तक भी गया, ताकि वे मुआवज़े की माँग न कर सकें। वाह रे! जीने की कला सीखाने वाले और सीखने वाले, साथ में मुकदर्शक बनी वह सरकार जो कल तक किसानों को फ़सल बीमा का चोला पहनाकर आगामी चुनाव की तैयारी कर रही थी और वह रे वित्तमंत्री साहब जिन्होंने बजट में किसानों को बड़े ही ख़ूबसूरत और कभी पूरे न होने वाले सपने दिखाए।



इस कार्यक्रम में पहुँचे ‘परिधान मंत्री’ के मुखार्विंद से निकली वे दो पंक्तियाँ भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होनी चाहिए जिसमें उऩ्होंने कहा, "हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होनी चाहिए, लेकिन यदि हम अपनी ही परंपरा और संस्कृति की ही बुराई करेंगे तो बाक़ी क्या कहेंगे। यह कला का कुंभ है।"
अब सवाल यह है ऐसे कला के कुंभ में डुबकी लगाने और ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखा कर भारत का सिर विश्वपटल पर ऊँचा करने की आवश्यकता ही क्या है? क्या ज़रूरत है दुनिया को दिखाने की कि हमारे पास श्री श्री रविशंकर जी महाराज जैसे महारथी हैं जो जीने की ऐसी कला सीखा रहे हैं जिसमें करोड़ो रुपये ख़र्च हो रहे हों।
अब इस कार्यक्रम की शुरूआत की बात करें तो शुरूआत में भी ड्रामा कम नहीं हुआ। जुर्माने को लेकर जो नौटंकी हुई उससे भी आप भली-भाँति वाक़िफ़ हैं, इसलिए ज़्यादा तह में जाने की दरकार नहीं है। लेकिन यह बताना वाक़ई आवश्यक है कि जो बाबा अपने महोत्सव में क़रीब 25.63 करोड़ रुपये ख़र्च कर रहे हैं, उनकी संस्था द्वारा 5 करोड़ जुर्माना देना वास्तव में बड़ी बात है। मेरे ख़्याल से तो जुर्माना लेना ही नहीं चाहिए, क्योंकि प्रकृति के नुक़सान की भरपाई जुर्माने से संभव नहीं है, चाहे जुर्माना कितना भी बड़ा ही क्यों न हो।
इतना सब जानने के बाद भी यदि उन अनुमानतः 35 लाख लोगों के साथ आप जीने की कला यानी आर्ट ऑफ़ लिविंग के कुंभ (मेरे ख़्याल से महाकुंभ) में डुबकी लगाने जा रहे हैं तो आपको मेरी ओर से अनंत शुभकामनाएँ, आपकी मनोरथें पूरी हों! आज मेगा शो का अंतिम दिन भी है।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

शनिवार, 12 मार्च 2016

दाढ़ी की ओर लौटते युवा

कुछ दिन पहले तक आपको या हमें जब भी ऑफ़िस जाना होता था या नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना होता था, किसी की शादी, ब्याह आदि में जाना होता था, तो इन तमाम जगहों पर जाने की तैयारी में सबसे पहली तैयारी हजामत यानी दाढ़ी कटवाने की होती थी। मतलब साफ़ था कि हमें चिकना दिखना है। वही आज के संदर्भ में बात करें तो इसके उलट हो रहा है। आज कही भी किसी भी कार्यक्रम में जाना होता है जहाँ स्पेशल दिखना ज़रूरी हो जाता है, वैसी स्थिति में आज भी हम सैलून की ओर रुख़ करते हैं, लेकिन दाढ़ी साफ़ करवाने के लिए नहीं, बल्कि ट्रीम यानी महीन, छोटी-छोटी करवाने के लिए।

थोड़ी स्टैंडर्ड भाषा में कहें तो इस दाढ़ी कटवाने की प्रकिया को आजकल सेट करवाना कहा जा रहा है। इसका क्रेज़ इतना बढ़ता जा रहा है कि दाढ़ी उगाने के लिए कुछ दवाएँ और क्रीमों का इस्तेमाल करने से भी नहीं कतरा रहे हैं। इसके लिए बीयर्ड जैसे तमाम प्रोडक्ट भी बाज़ार में आ गए हैं जो दाढ़ी उगाने में युवाओं की मदद कर रहे हैं। इसमें सबसे आगे उस्तरा नामक कंपनी है जो Mooch & Beard Tonic नाम से अपना प्रोडक्ट बेच रही है।


 



 यह तस्वीरें उन चंद लोगों की हैं जो आजकल ऐसी क्रीमों का सहारा ले रहे हैं।





कुछ दिन पहले  की बात करें तो जब रणवीर सिंह अभिनीत बाजीराव मस्तानी रिलीज़ हुई थी उस समय भी हरदम चिकने रहने वाले युवाओं को लम्बी और घनी मूँछों में देखा गया था। तो कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ज़माना फिर से वहीं जा रहा है जहाँ से शुरू हुआ था।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्...