जी हाँ, आपने बिल्कुल
सही पढ़ा, आज से सरकार, तमाम राजनीतिक पार्टियों और मीडिया ने ऐलान किया है कि आप
मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आपको स्वास्थ्य बीमा ना होने के बाद भी
जातिगत वोट के ख़ातिर मुआवज़ा मिल सके और प्राइम टाइम में जगह दी जा सके। आज यह
वाक्य इसलिए प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि हाल- फिलहाल के दिनों में जो कुछ घटनाएँ
घटित हुईं हैं, चाहे वह दादरी कांड में अख़लाक की मौत पर राजनीति और मीडियानीति या
फिर रोहित वेमुला वाली घटना ही क्यों न हो। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिस मीडिया और
राजनीतिक पार्टियों ने इन सब घटनाओं को अंतर्राष्ट्रीय घटना बताया, वही आज डॉ.
नारंग की हत्या पर ऐसी चुप्पी साधकर बैठी है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। वह इसलिए
क्योंकि नारंग ने मरने से पहले अपनी जाति मुसलमान या दलित नहीं बताया। वर्तमान
परिस्थितियों को देखकर यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि मौत भी जातिगत हो गई है,
चाहे वह मौत आत्महत्या वाली ही क्यों न हो।
दादरी कांड की बात करें
तो वहाँ सभी पार्टियों ने जमकर राजनीति खेली, जहाँ तक मेरी जानकारी है तो इस कांड
में अख़लाक के परिजनों को क़रीब 45 लाख का मुआवज़ा दिया गया और ग्रेटर नोयडा में
फ़्लैट भी दिया गया। हालाँकि यह बात अलग है कि अख़लाक के परिजन उस फ़्लैट में रह
रहे हैं या नहीं या फिर देने वाला ही उस फ़्लैट को किराए पर दे दिया है। इसकी
जानकारी उपलब्ध नहीं है।
मीडिया ने भी भरपूर
कवरेज़ किया, प्राइम टाइम तो जैसे उसके लिए ही बिक गया था, 15-20 दिन तक जब भी कोई
चैनल खोलो तो सिर्फ़ दादरी और अख़लाक ही दिखाई दे रहा था। उसके बाद रोहित वेमुला
कांड हुआ जिसे लेकर फिर वही हुआ जो दादरी कांड में हुआ, वह सब इसलिए हुआ, क्योंकि
रोहित को दलित घोषित किया गया, जबकि अख़लाक तो पहले से ही मुसलमान समुदाय का था
जिसे वोट बैंक माना जाता रहा है। देश के कई दिग्गज़ नेता हैदराबाद पहुँचकर रोहित
की जन्मकुंडली खंगालकर उसे दलित साबित करने में जुट गए, धरने पर बैठे और भी पता
नहीं कौन-कौन से कर्म किए?
उसके बाद शहीद हनुमंथप्पा
का मामला आया, वह जवान 8 दिन बर्फ में रहने के बाद इस दुनिया से रुख़सत हो गया,
उसके लिए पूरे देश में दुआएँ मांगी गईं, लेकिन दुःख की बात की दुआएँ बेअसर साबित
हुईं, लेकिन इस मामले में किसी राजनीतिक पार्टी ने न रुची दिखाई और न ही मीडिया
ने, क्योंकि वहाँ पर न मुआवज़ा ज़रूरी था और न ही प्राइम टाइम में बहस।
कायदे से इसी घटना पर
बहस होनी चाहिए, ताकि सैनिकों के लिए कोई बेहतर विकल्प निकाला जा सके
और उन्हें आधुनिक सुविधाएँ मुहैया कराई जा सके, लेकिन वह नहीं हुआ, क्योंकि
हनुमंथप्पा ने ख़ुद को मरने से पहले दलित या मुसलिम घोषित नहीं किया था। ऐसे में
यह ज़रूरी है कि आप भी मरने से पहले अपनी जाति बताकर मरें, ताकि आप अंतर्राष्ट्रीय
मीडिया में अपनी जगह बना सकें और राजनीतिक स्वास्थ्य बीमा का लाभ ले सकें।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते
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