मंगलवार, 13 सितंबर 2016

हिन्दी में दूसरी भाषा के शब्दों का प्रचलन क्या हिन्दी के लिए अभिशाप नहीं है ?

आज यानि 14 सितम्बर को हिन्दी पट्टी में हिन्दी दिवस की धूम है। कई जगह संगोष्ठी का भी आयोजन हुआ है जहाँ बड़े-बड़े साहित्यकार अपना जलवा दिखाएँगे। हर साल की तरह यह इस साल का भी हिन्दी दिवस संगोष्ठियों और आयोजनों के साथ ख़त्म हो जाएगा, लेकिन यह भी सोचना अनिवार्य है कि हिन्दी में जिस तरह अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा वह हिन्दी के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है?

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मेरे हिसाब से हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन, हिन्दी भाषा के लिए सर्वथा अभिशाप है। जैसा की सर्वविदित है कि हिन्दी भाषा का जन्म संस्कृत भाषा से हुआ है। संस्कृत सबसे पहले प्राकृत भाषा बनी, उसके बाद अपभ्रंश भाषा और फिर हिन्दी का जन्म हुआ।



किसी भी भाषा में किसी दूसरी भाषा के शब्दों का प्रचलन हमेशा अभिशाप ही होगा, आशीर्वाद क़तई नहीं हो सकता है। चाहे वह भाषा हिन्दी हो या फिर कोई अन्य भाषा ही क्यों न हो, क्योंकि जब किसी भाषा में अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन बढ़ने लगता है तो उस मूल भाषा के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है। यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि आखिर मूल भाषा के शब्द कौन-से हैं और कौन-से नहीं। यही आज हिन्दी के साथ हो रहा है।

जिस प्रकार प्रत्येक भाषा की ख़ुद की एक अलग पहचान होती है, उसकी अपनी एक अलग प्रकृति होती है। ठीक उसी प्रकार हिन्दी की भी अपनी प्रकृति और एक अलग पहचान है, लेकिन जैसे ही इसमें अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग होने लगता है तो इसकी अपनी मूल प्रकृति नष्ट होने लगती है। आज हम अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग हिन्दी में इसके मूल रूप को एक किनारे पर रख कर रहे है। आज हमें अन्य भाषा के शब्दों को प्रयोग करने में सहुलियत महसूस हो रही है क्योंकि आज हमारे पास कम्प्यूटर है जिसकी वजह से इस पर टंकण (टाईप) करने में आसानी हो रही है।

हालांकि कुछ विद्वानों का मानना है कि इससे हिन्दी  का विकास होगा, यह और लोकप्रिय होगी, समृद्ध होगी और यह जन-जन की भाषा होगी, लेकिन यह भी सोचने का विषय है कि उस विकास से क्या फ़ायदा जिससे वह मूल वस्तु ही समाप्त हो जाए। ऐसा विकास नहीं चाहिए जिससे भाषा अपने मूल रंग को छोड़कर किसी अन्य रंग में इस क़दर रंग जाए कि अपनी पहचान ही खो बैठे। यदि यह विकास इसी प्रकार होता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं है जब हम कहने के लिए तो हिन्दी बोलेंगे, लेकिन शब्द हिन्दी की जगह किसी और भाषा के होंगे। जैसे हिन्दी सिनेमा में होता है। कहने के लिए तो वह ‘हिन्दी फीचर फिल्म’ होती है, जबकि उसका नाम ही वांटेड, रॉक-स्टार, अगली, स्टूडेंट-ऑफ-दी ईयर और सन ऑफ़ सरदार जैसा होता है।

हिन्दी में अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग ठीक उसी प्रकार हो रहा है जिस प्रकार दूध में पानी का प्रयोग होता है। यहाँ एक बात ग़ौर करने वाली है कि पानी के प्रयोग से दूध की मात्रा तो बढ़ रही है (जैसा कि विद्वानों का मानना है) परंतु उसकी गुणवता हमेशा के लिए समाप्त हो रही है, जिसे वापस पाना मुमकिन नहीं है।

आज तो हम दूसरी भाषा के शब्दों पर इस प्रकार निर्भर हो गए हैं कि उसके बिना हमारा काम चल ही नहीं सकता, क्योंकि हमने आज हिन्दी के उन मूल शब्दों को खो दिया है जिसके बदले में हम दूसरी भाषा के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। हम दूसरी भाषा के शब्दों के प्रयोग में इस तरह व्यस्त हो गए कि हमें पता ही नहीं चला कि हिन्दी के मूल शब्द कब हमारी आँखों के सामने से ओझल हो गए, जिसका खामियाज़ा आज हिन्दी भाषा को भुगतना पड़ रहा है।

यदि हम थोड़ा सा हटकर सोचें कि आख़िर ऐसी क्या ज़रूरत पड़ गई कि हमें हिन्दी को लिखने-पढ़ने के लिए दूसरी भाषा के शब्दों का सहारा लेना पड़ा। इसका जवाब यह होगा कि कम्प्यूटर संचालन में सहुलियत के लिए या फिर भाषा का प्रयोग संक्षेप में करने के लिए, क्योंकि मनुष्य की यह प्रवृति होती है कि वह हमेशा किसी दूसरे आसान विकल्प की तलाश में रहता है और जैसे ही उसकी यह तलाश पूरी होती है वह अपना रुख़ नए विकल्प की ओर कर लेता है।

किसी भी युग में हमेशा से सामान्यतः दो भाषाओं की परम्परा रही है। पहली तो शिष्टजनों की भाषा तथा दूसरी आम-लोगों की भाषा। आज भी यह परम्परा पूरी तरह से कायम है। आज शिष्टजनों की भाषा हिंग्लिश (हिन्दी और अंग्रेज़ी का मिश्रण) है और आम-लोगों की भाषा हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, उड़िया या और कोई भी क्षेत्रिय भाषा हो सकती है।

वर्तमान समय में हिन्दी में यदि सबसे ज़्यादा किसी भाषा के शब्दों का प्रचलन बढ़ा है तो वह अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों का है। तक़रीबन तीन हज़ार अंग्रेज़ी के शब्द हिन्दी में आज इस क़दर घुल-मिल गए हैं जैसे वे शब्द हिन्दी के अपने ही खानदान के हों। जैसे- कमीज़ का शर्ट होना, बोतल का बॉटल होना, अपराध का क्राईम होना, तौलिया या अंगौछा का टॉवेल होना, हत्या का मर्डर होना, इत्यादि। ऐसे बहुत शब्द हिन्दी में आ गए हैं जिन्हें एक नज़र में चिन्हित करना मुश्किल है।

हिन्दी का मूल स्वरूप बिगाड़ने में सोशल मीडिया का भी अहम योगदान है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। इसने तो हिन्दी को हिंग्लिश और रोमन बना दिया है और यह काफ़ी हद तक सफल भी हो रहा है। जिस तरह संस्कृत से हिन्दी का उदय हुआ, ठीक उसी प्रकार हिन्दी से हिंग्लिश का उदय होता हुआ साफ-साफ नज़र आ रहा है, परंतु सवाल तो हिन्दी का है। दूसरी भाषा के शब्दों का हिन्दी में प्रचलन से हिन्दी का विकास तो हो रहा है, लेकिन हिन्दी का हिंग्लिश और रोमन होना इसका विकास नहीं अपितु यह हिन्दी का विनाश है।

कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि हिन्दी भाषा में किसी अन्य भाषा के शब्दों का प्रचलन कदापि उचित नहीं है और यह हमेशा हिन्दी के मूल अस्तित्व के लिए अभिशाप ही होगा, आशीर्वाद किसी भी सुरत में नहीं हो सकता है।

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्...