गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?


मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्टि के लिए टीवी चैनल बदलने लगा तो किसी ने मोबाइल का सहारा लिया. सभी लोग अपने-अपने स्तर पर घोषणा की पुष्टि में जुट गए. यह घोषणा थी 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद करने की.

8 नवंबर की रात 8 बजे पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया, नोटबंदी की घोषणा की और कालेधन कुबेरों से निपटने के लिए 50 दिन का वक़्त मांगा. पहले तो देश की जनता को अपने ही कानों पर यकीन नहीं हुआ लेकिन लोगों ने नोटबंदी को एक बेहतर फैसला माना और पीएम मोदी के नोटबंदी वाले महायज्ञ में तन-मन और जन से जुट गए.



पीएम मोदी ने 50 दिन का समय तो मांगा ही था, साथ में ये भी कहा था कि मित्रों घबराने की जरूरत नहीं है, जल्द ही हालात सामान्य हो जाएंगे. आपको किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी. पीएम मोदी के भाषण के 2 दिन बाद नोटबंदी का वह महायज्ञ शुरू हुआ जिसे लेकर लोगों की उम्मीदें थी कि इसके हवनकुंड में सारा कालाधन स्वाहा हो जाएगा.

नोटबंदी की घोषणा के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि हर रोज नोटबंदी के नियम बदले गए, क्योंकि सिर्फ 43 दिनों में ही 59 बार नियम बदले गए. आज 50 दिन पूरे होने के बाद भी 50 फीसदी एटीएम में पैसे नहीं हैं. बैंकों की भी हालत वैसी ही है जैसे नोटबंदी के पहले दिन थी.

सोचने वाली बात ये है कि जिस सरकार ने नोटबंदी की घोषणा में कहा कि बेचैन होने और घबराने की जरूरत नहीं है. 31 दिसंबर तक आप बैंकों में आराम से पैसे जमा करा सकते हैं और पुराने नोट बदलवा सकते हैं. उसी सरकार की ओर से एक और फरमान आया कि बैंकों में अब केवल पैसे जमा होंगे, बदले नहीं जाएंगे. लोगों ने इस फैसले को भी स्वीकार किया. तभी एक और फैसला आया कि बैंक में पैसे जमा करने से पहले आपको सफाई देनी होगी कि अभी तक आप कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.

सरकार ने हर रोज नियम बदले, कभी पैसे बदलवाने की सीमा तय की गई तो कभी पुराने नोट कहां चलेंगे और कहां नहीं, इसी सूचना दी गई. यहां यह भी बात गौर करने वाली है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों एकमत नहीं दिखे. वित्त मंत्री ने कहा कि पैसे जमा करने पर आपसे कोई सवाल-जवाब नहीं होगा, लेकिन बैंक में पैसे जमा करने जाओ तो लिखित में बताना पड़ रहा है कि अभी तक कहां थे कि पैसे जमा नहीं हुए.

नोटबंदी के बाद सरकार के महायज्ञ में खुद को झोंकते हुए हर फैसले को लोगों ने स्वीकार किया. लोगों ने पेटीएम का इस्तेमाल करना भी सीख लिया. गोलगप्पे वाले से लेकर सब्जी वाले, ठेले वाले, यहां तक की मोची ने भी पेटीएम से पैसे लेना शुरू कर दिया. इसी बीच 25 दिसंबर को स्टेट बैंक की ओर से एक ट्वीट किया गया कि स्टेट बैंक के ग्राहक पेटीएम इस्तेमाल नहीं कर सकते. उन्हें सलाह दी जाती है कि वे स्टेट बैंक की निजी ऐप बेस्ट बड्डी का इस्तेमाल करें.


एक फैसला और था जिसने आम जनता को झकझोर दिया. यह फैसला था कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से पुराने नोटों की जितनी रकम चाहें, बैंक में जमा करवा सकते हैं. वित्त मंत्रालय के राजस्व सचिव ने अपने एक बयान में कहा कि राजनीतिक दल अपनी मर्जी से कितनी भी रकम पुराने नोटों में बैंक में जमा करवा सकते हैं और उनसे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी, लेकिन अगर कोई साधारण नागरिक ढाई लाख रूपए से ज्यादा की रकम बैंक में जमा करवाता है तो उससे आयकर विभाग सवाल-जवाब करेगी.

इस छूट के पीछे लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी का हवाला दिया गया. लोकप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29-सी के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल देश के किसी भी व्यक्ति या कंपनी से कितनी भी छोटी या बड़ी रकम का स्वैच्छिक दान ले सकता है. उसे बस 20 हजार से ज्यादा का चंदा देने वाले लोगों के नाम चुनाव आयोग को बताना पड़ता है.

तो क्या नोटबंदी का फैसला देश की आम जनता की मेहनत से कमाई हुई राशि को बैंक में लाने के लिए था, जिसे कालाधन का तमगा लगाकर सरकार अपनी सेखी बघार सके और बाद में ये कह सके कि नोटबंदी के बाद बैंकों में इतने कालेधन जमा हुए हैं.

बाकी इन पचास दिनों में आप तो समझ ही चुके होंगे कि नोटबंदी का फैसला किसके लिए था, असली काले धन-कुबेरों के लिए या देश के तमाम नेताओं के लिए या फिर आम आदमी के पैसों को बैंकों में लाने के लिए ?

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

नाम से भविष्य तय होता तो रणवीर आर्मी चीफ होते, ममता-मायावती अनाथालय चलातीं, पीएम मोदीखाना और...


जब से करीना कपूर ने बच्चे को जन्म दिया है तब से बधाईयाँ कम, शिक़ायतें ज़्यादा मिल रही हैं। मुबारक़बाद देने वालों की संख्या कम, आलोचकों की संख्या कुछ ज़्यादा ही हो गई है। बच्चे ने अभी आँखें भी नहीं खोली कि उसके कानोंं में यह बात गूंजने लगी कि तेरे बाप ने तेरा नाम तैमूर रखा है, तू तैमूर की तरह ही खूंखार होगा, तू उसी की तरह लोगों को सताएगा और तू उसी की तरह बर्बरता की हदें पार करेगा।

मु्द्दे पर आने से पहले तैमूर लंग के अंदर भी झाँक लेना ज़रूरी है। तैमूर 14वीं सदी का शासक था। प्रत्यक्ष रूप से तो वह दुनिया का सबसे बर्बर और निष्ठुर शासकों में से एक था, लेकिन जो अप्रत्यक्ष है उस पर ग़ौर करना भी ज़रूरी है। उसे मुस्लिम कहना भी पूरी तरह से जायज़ नहीं है, क्योंकि उसके पिता ने इस्लाम कबूल किया था। उसका इरादा सिकंदर और चंगेज खां की तरह विश्वविजेता बनना था। तैमूर के बारे में अधिक जानने के लिए आप गूगल बाबा या इतिहास की किताब का सहारा ले सकते हैं।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर कि करीना कपूर और सैफ अली खान के बेटे के तैमूर नाम से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है? लोगों को नाम से इतनी नफरत क्यों हो रही है? क्या इसलिए कि तैमूर लंग एक मुस्लिम शासक था या फिर इसलिए कि वह बर्बर शासक था? बर्बर तो हिटलर भी था। मेरे ख़्याल से तो जिन लोगों को तैमूर नाम से दिक्कत है वे या तो छोटी मानसिकता के हैं या फिर उन्हें फिर किसी जाति विशेष से नफरत है और यदि जाति विशेष से नफरत है तो यही विरोध उस समय क्यों नहीं हुआ जब  2012 में करीना ने सैफ का हाथ थामा. दूसरी बात यदि मानसिक दिक्कत है तो इसका कोई इलाज नहीं है, यह लाइलाज है।

KAREENA FAKE

नाम से भविष्य तय होता है क्या ?

जो लोग करीना के बेटे के नाम से कूढ़ रहे हैं उनके साथ ये भी दिक्कत है कि उन्हें लगता है कि नाम से ही भविष्य तय होता है। चलिए हम उनकी बात थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि नाम से भविष्य तय होता है तो फिर राम सिंह को राम की तरह होना चाहिए, जबकि वह एक डाकू था। कल्याण सिंह गूजर भी एक डाकू था, जबकि उसे लोगों का कल्याण करना चाहिए था। इस लिहाज से तो बसपा सुप्रीमो मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अनाथालय चलाना चाहिए, क्योंकि दोनोंं के नाम से ममता छलक रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मोदीखाना (किराने की दुकान) चलाना चाहिए था। अभिनेता रणवीर सिंह को आर्मी चीफ होना चाहिए था, क्योंकि उनके नाम में रण भी है और वीर भी है। नवाज शरीफ़ और राहिल शरीफ़ को भी शरीफ़ होना चाहिए था, लेकिन फिलहाल जो वे हैं ये बताने की ज़रूरत नहीं है।

 नोट- करीना की बेटे के साथ इस फोटो की जाँच की जा रही है, क्योंकि इस फोटो पर अभी संदेह है कि यह असली फोटो है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मोदी जी के नाम बंद ख़त : आप कालिदास मत बनिए प्लीज़...


आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,

मोदी जी आपने कालिदास की वह कहानी तो सुनी ही होगी, जिसके लिए उन्हें मूर्ख का तमगा मिला. वैसे तो आप में और कालिदास जी में काफी अंतर है. वह अंतर यह है कि कालिदास जिस पेड़ की डाली पर बैठे थे उसे वे ख़ुद ही काट रहे थे और आप जिस पेड़ की डाली पर हैं उसे आपके शुभचिंतक काट रहे हैं.

कालिदास जी को एक ओर जहां उनकी विद्वता के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें मूर्ख की श्रेणी में भी रखा गया है. हाल के कुछ दिनों से जिस तरह से आपके फ़ैसले हो रहे हैं उनमें कालिदास की मूर्खता वाली छवि साफ़ नज़र आ रही है.

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आपने 8 नवंबर को रात 8 बजे नोटबंदी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन आपने दूर का नहीं सोचा. क्योंंकि शायद आप संस्कृत के इस श्लोक में यक़ीन नहीं करते हैं कि 'अग्र सोची सदा सुखी'. नोटबंदी के बाद जिस तरह से देश के हालात बदले उससे आपको भी अफ़सोस हो ही रहा होगा.

आपके ज़ेहन में यह बात बार-बार उफान मार रही होगी कि बिना तैयारी नोटबंदी का फ़ैसला ग़लत था. हालात को देखकर यह भी कह सकते हैं कि वह फ़ैसला आपका नहीं था, क्योंकि इतना तो देश के लोगों को मालूम ही है कि आपके फ़ैसले बिना तैयारियों के नहीं होते.

मोदी जी, ज़रा सोचिए कि हम स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने जाते है और पहुँचने पर पता चलता है कि ट्रेन रद्द कर दी गई है या उसकी जगह दूसरी ट्रेन को दूसरे समय पर रवाना किया जाएगा तो कितनी परेशानी होती है. यहां तो नोटबंद के नियमों मे रोज़ बदलाव हो रहे हैं. तो सोचिए लोगोंं की क्या हालत हो रही है.

यहां एक और बात ग़ौर करने वाली है कि जनता इतना कष्ट सहते हुए भी आपके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा रही है, क्योंकि आपने उसे अच्छे दिनों का सपना दिखा रखा है, लेकिन अब जनता के तेवर बदलने लगे  हैं.

नोटबंदी के बाद विपक्षी दलों ने कहा कि मोदी सरकार ने नोटबंदी की जानकारी अपने लोगों को पहले ही दे दी थी तो सरकार की ओर से बयान आया कि नोटबंदी की जानकारी कुछ तय लोगों को छोड़कर बाक़ी किसी को नहीं थी. वहीं दूरदर्शन के एक पत्रकार के दावे को मानें तो नोटबंदी पर आपके भाषण की रिकॉर्डिंग 1 महीने पहले ही हो गई थी.

आपने नोटबंदी की घोषणा कालेधन को निकालने के लिए की, लेकिन पता चला कि कालेधन रातों-रात सफ़ेद किए जा रहे हैं. नोट बदलवाने के लिए आम आदमी लाइन में खड़ा मौत को गले लगा रहा है और नेताओं के लिए रात में भी बैंक खोले जा रहे हैं.

महाराष्ट्र के सहकारी बैंकों में बैक डेट में ड्राफ़्ट बने, बॉण्ड ख़रीदे गए और पैसे सफेद किए गए. तो क्या ये पैसे सफ़ेद करवाने वाले आम आदमी थे. बिल्कुल नहीं, ये वे लोग थे जिनके कालेधन को निकालने के लिए आपने नोटबंदी की. स्थिति यथावत है.

नोटबंदी के बाद आपने सोना पर धावा बोला, आपने घर में  सोना रखने की सीमा तय की. आपके नए क़ानून के मुताबिक विवाहित महिलाएँ घर में 500 ग्राम, अविवाहित महिलाएँ 250 ग्राम सोना और पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकते हैं. वहीं पुश्तैनी गहनों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

आपने यहाँ भी वही ग़लती की जो आपने नोटबंदी के समय की थी. आपने इस बार भी आगे-पीछे का कुछ नहीं सोचा, बस क़ानून बना दिया. अब यहाँ सवाल ये है कि आप कैसे तय करेंगे कि किसी के घर में रखा गहना पुश्तैनी है, क्योंकि यदि आपको ही अपने पुश्तैनी गहनों का सबूत देना हो तो आपको चक्कर आ जाए.

यह भी तो हो सकता है कि किसी के पास पुश्तैनी गहने ठीक-ठाक हैं लेकिन वह अपनी स्थिति को सुधारने के लिए उन गहनों का इस्तेमाल नहीं करता हो, बल्कि वह उसे वह अपने पुरखों के निशानी के तौर पर रखना चाहता हो. फिर ऐसे में तो आप उसे गिरफ्तार कर लेंगे, क्योंकि आपके क़ानून के हिसाब से वह कालाधन रखने वाला धनकुबेर है.

चलते-चलते एक बार आपसे फिर कहूंगा कि आप प्लीज़ कालिदास मत बनिए.

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्...