नई दिल्ली में 44वें विश्व पुस्तक मेले का सफल आयोजन 9 से 17 जनवरी 2016 के बीच किया गया। इस मेले में सैकड़ों किताबों का विमोचन किया गया। कई बड़े पत्रकारों ने इस मेले में शिरकत की, वहीं मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन और नरेन्द्र कोहली जैसी हस्तियाँ भी पहुँची। अब आते हैं असली मुद्दे पर इस मेले का आयोजन तब हुआ जब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, जब देश में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या (2015) 243,198,922 है, जब लगभग सभी युवाओं के पास स्मार्टफ़ोन है, जब कभी किताब की ओर पलट कर भी ना देखने वाला युवा स्मार्टफ़ोन में ई-बुक पढ़कर काम चला ले रहा है, वॉट्सऍप पर बड़ा-बड़ा चिट्ठा पढ़ रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि आज का वह वर्ग जो ऑनलाइन 50-60% की छूट पर ख़रीदारी कर रहा है, वह इतनी संख्या में 10 प्रतिशत की छूट पर ख़रीदारी करने क्यों गया? आपको बता दें कि इस बार के मेले में क़रीब 12 लाख लोग पहुँचे थे। इस भीड़ ने उस मिथक को तोड़ दिया कि भारत में लोग किताब नहीं पढ़ते और यहाँ पाठकों की संख्या कम हो रही है। पाठकों की संख्या का अनुमान आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि एचबीजी (अमेरिकी प्रकाशन) के अरविंद बताते हैं कि पहले दिन ही 3.5 लाख के बिक्री हुई, जो पिछले साल 2 लाख की थी। मतलब साफ़ है कि युवा पढ़ तो रहा है, उसके अंदर पढ़ने की ललक पहले से ज़्यादा हो रही है, भले ही यह ललक फ़ेसबुक या वॉट्सऍप पर पढ़कर ही क्यों न जगी हो, लेकिन जगी तो ज़रूर है। इसमें कोई शक नहीं है। वैसे इस मेले में भीड़ का होना इसलिए भी ज़रूरी था, क्योंकि इस पुस्तक मेले का मुख्य अतिथि चीन था जिसने सबसे पहले छपाई को जन्म दिया था और हमारे यहाँ अतिथि तो देवता होता है (अतिथि देवो भवः), फिर स्वागत करना तो बनता ही है।
अब बात आती है हिन्दी की, तो आपको बता दें ज़माना अब हिन्दी का ही आ रहा है, क्योंकि हिन्दी के किताब के स्टालों पर क़रीब 1 किलोमीटर लंबी लाईन लगी थी जो कि अंग्रज़ी को मुँह चिढ़ाने जैसी थी। वैसे मेले में प्रकाशकों की बात करें तो उन सबने किताबों की ऊँची दामों से पाठकों को ठेस तो ज़रूर पहुँचाया। यदि आपको थोड़ा-सा अर्थशास्त्र का ख़्याल आ रहा हो तो आपने ज़रूर पढ़ा होगा कि जब किसी वस्तु की मांग बाज़ार में कम हो जाती है तो उसका दाम भी कम हो जाता है, लेकिन यहाँ तो इसके विपरित हुआ। अब कुछ वरिष्ठजन जो यह कहते हैं कि ऑनलाइन के ज़माने में लोग किताबें नहीं पढ़ रहे, तो अब यह उनका कहना सरासर अन्याय होगा, क्योंकि नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2016 में यह झूठा साबित हो गया, क्योंकि यदि लोग नहीं पढ़ते तो किताबें सस्ती होती, न की महंगी। कुल मिलाकर यह तो कहा ही जा सकता है कि यह मेला युवाओं को एक नया तजुर्बा तो देकर गया ही।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते



