मंगलवार, 19 जनवरी 2016

नई पीढ़ी को नया तजुर्बा दे गया दिल्ली पुस्तक मेला!

नई दिल्ली में 44वें विश्व पुस्तक मेले का सफल आयोजन 9 से 17 जनवरी 2016 के बीच किया गया। इस मेले में सैकड़ों किताबों का विमोचन किया गया। कई बड़े पत्रकारों ने इस मेले में शिरकत की, वहीं मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन और नरेन्द्र कोहली जैसी हस्तियाँ भी पहुँची। अब आते हैं असली मुद्दे पर इस मेले का आयोजन तब हुआ जब डिजिटल इंडिया की बात हो रही है, जब देश में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या (2015) 243,198,922 है, जब लगभग सभी युवाओं के पास स्मार्टफ़ोन है, जब कभी किताब की ओर पलट कर भी ना देखने वाला युवा स्मार्टफ़ोन में ई-बुक पढ़कर काम चला ले रहा है, वॉट्सऍप पर बड़ा-बड़ा चिट्ठा पढ़ रहा है। 
अब सवाल यह उठता है कि आज का वह वर्ग जो ऑनलाइन 50-60% की छूट पर ख़रीदारी कर रहा है, वह इतनी संख्या में 10 प्रतिशत की छूट पर ख़रीदारी करने क्यों गया? आपको बता दें कि इस बार के मेले में क़रीब 12 लाख लोग पहुँचे थे। इस भीड़ ने उस मिथक को तोड़ दिया कि भारत में लोग किताब नहीं पढ़ते और यहाँ पाठकों की संख्या कम हो रही है। पाठकों की संख्या का अनुमान आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि एचबीजी (अमेरिकी प्रकाशन) के अरविंद बताते हैं कि पहले दिन ही 3.5 लाख के बिक्री हुई, जो पिछले साल 2 लाख की थी। मतलब साफ़ है कि युवा पढ़ तो रहा है, उसके अंदर पढ़ने की ललक पहले से ज़्यादा हो रही है, भले ही यह ललक फ़ेसबुक या वॉट्सऍप पर पढ़कर ही क्यों न जगी हो, लेकिन जगी तो ज़रूर है। इसमें कोई शक नहीं है। वैसे इस मेले में भीड़ का होना इसलिए भी ज़रूरी था, क्योंकि इस पुस्तक मेले का मुख्य अतिथि चीन था जिसने सबसे पहले छपाई को जन्म दिया था और हमारे यहाँ अतिथि तो देवता होता है (अतिथि देवो भवः), फिर स्वागत करना तो बनता ही है।
अब बात आती है हिन्दी की, तो आपको बता दें ज़माना अब हिन्दी का ही आ रहा है, क्योंकि हिन्दी के किताब के स्टालों पर क़रीब 1 किलोमीटर लंबी लाईन लगी थी जो कि अंग्रज़ी को मुँह चिढ़ाने जैसी थी। वैसे मेले में प्रकाशकों की बात करें तो उन सबने किताबों की ऊँची दामों से पाठकों को ठेस तो ज़रूर पहुँचाया। यदि आपको थोड़ा-सा अर्थशास्त्र का ख़्याल आ रहा हो तो आपने ज़रूर पढ़ा होगा कि जब किसी वस्तु की मांग बाज़ार में कम हो जाती है तो उसका दाम भी कम हो जाता है, लेकिन यहाँ तो इसके विपरित हुआ। अब कुछ वरिष्ठजन जो यह कहते हैं कि ऑनलाइन के ज़माने में लोग किताबें नहीं पढ़ रहे, तो अब यह उनका कहना सरासर अन्याय होगा, क्योंकि नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2016 में यह झूठा साबित हो गया, क्योंकि यदि लोग नहीं पढ़ते तो किताबें सस्ती होती, न की महंगी। कुल मिलाकर यह तो कहा ही जा सकता है कि यह मेला युवाओं को एक नया तजुर्बा तो देकर गया ही।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते 

बुधवार, 13 जनवरी 2016

पलक की गिरफ़्तारी और कठघरे में खड़े हास्य कलाकार

क्या अब इस देश में कॉमेडी करना, किसी की नक़ल उतारना, किसी से मजा़क करना भी गुनाह होता जा रहा है? क्या इससे पहले किसी हास्य कलाकार ने किसी बाबा, किसी अभिनेता या नेता की नक़ल नहीं की ? यह सवाल सिर्फ़ मेरे ही ज़ेहन में नहीं, बल्कि देश के तमाम लोगों के ज़ेहन में तब से उठ रहे हैं जब से 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिल' की पलक उर्फ़ कीकू शारदा की गिरफ़्तारी हुई है।


बाबाओं से अभी तक तो केवल आम जनता ही परेशान थी, लेकिन पलक की गिरफ़्तारी इस बात की ओर संकेत करती है कि बाबा लोग केवल लोगों को चूना ही नहीं लगा सकते, बल्कि किसी को जेल भी भिजवा सकते हैं, चाहे वह कोई हास्य कलाकार ही क्यों न हो। हैरानी वाली बात तो यह है कि हास्य कलाकार द्वारा माफ़ी मांगने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा गया, जबकि उसे माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए, क्योंकि हास्य कलाकार ही जब मांफ़ी मांगने लगेगा तो फिर बच ही क्या जाएगा? यदि कीकू की गिरफ़्तारी जायज़ है तो फिर तमाम एफ़एम चैनल के आरजे (रिडियो जॉकी, एंकर) को भी अरेस्ट किया जाए, क्योंकि उनसे ज़्यादा भद्दा मज़ाक शायद ही कोई करता होगा। कॉमेडी फ़िल्मों पर, तमाम कॉमेडी शोज पर भी रोक लगाई जाए, धारावाहिकों पर भी रोक लगाई जाए, क्योंकि उसमें भी कभी सास की छवि, तो कभी बहू की छवि को नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है।

आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते!

रविवार, 10 जनवरी 2016

आख़िर क्या बला है 'वायरल' ?

'वायरल' शब्द का नाम तो आपने सुना ही होगा। वैसे आप जो वायरल समझ रहे हैं, मैं उस वायरल की बात नहीं कर रहा हूँ। आप शायद उस वायरल के बारे में सोच रहे हैं जब डॉक्टर कहता है कि आपको बदलते मौसम के कारण सर्दी या बुख़ार हो गया है जो कि वायरल है।


वायरल: वायरल वह बला है जब चंद मिनटों में कोई ख़बर, फ़ोटो, वीडियो या गाना इण्टरनेट पर बहुत सारे लोगों द्वारा देखा, पढ़ा या सुना जाए। इसका जन्म इण्टरनेट के पादूर्भाव और स्मार्टफ़ोन  के आने के बाद हुआ है जो आज किसी भी समय अपनी ओर लोगों का ध्यान खिंचने में समर्थ है।

अब चलिए बता ही देता हूँ, मैं उस वायरल की बात कर रहा हूँ जो आजकल अक़्सर आपको फ़ेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, वॉट्सऍप पर देखने, पढ़ने और सुनने को मिल रहा है। आजकल यह ऐसा शब्द हो गया है जिसे सुनते ही सबके कान खड़े हो जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, आप किसी को एक वीडियों दिखाइये तो वह एक बार में शायद ही देखेगा, लेकिन यदि आपने यह कह दिया है, "यार यह वीडियो देख ना, वायरल हो गयी है।" वह आदमी बिना किसी झिझक के पलटकर देखेगा। यह तो हो गई सोशल मीडिया और आम जनता की बात, अब आते हैं वास्तविक मीडिया में।
यदि आपने दुर्भाग्यवश आज की पत्रकारिता में आने का मन बना लिया है तो आपको इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि आप ऐसी ही ख़बरें लिखें जो तुरंत वायरल हो जाए, नहीं तो भाई साहब आप पत्रकारिता को तो भूल ही जाइए, क्योंकि आपको नौकरी तो मिलने वाली है नहीं। आलम तो यह है कि मीडिया घरानों में साक्षात्कार के समय भी पूछा जाने लगा है कि आपने स्कूप-हूप (scoopwhoop) या गजब पोस्ट (Gajabpost) ( इन दोनों वेबसाइटों पर वायरल ख़बरें ही मिलतीं हैं) देखी है? यदि आपका जवाब हाँ है तो सैलरी की बात होगी और यदि जवाब नहीं हुआ तो भाई साहब आप बिना कुछ कहे चुपचाप अपना तीन पन्ने वाला रिज्यूमे लेकर वापस आ जाएँ, यही बेहतर होगा।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते!

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

ब्लॉग का नाम चलते-चलते ही क्यों?

सबसे पहले तो आप सभी का “चलते-चलते” ब्लॉग पर स्वागत है। अब आपके ज़ेहन में एक सवाल उठ रहा होगा कि आख़िर इस ब्लॉग का नाम “चलते-चलते” ही क्यों? 

इसके दो कारण हैं -

  1. पहला -- कई दफ़ा ऐसा होता है कि आप कहीं की यात्रा पर होते हैं या फिर किसी से कम समय में जल्दी-जल्दी अपनी बात पूरी करते हैं, लेकिन इस मर्तबाँ कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं या कोई ऐसी बात हो जाती है जो आपके ज़ेहन में कई दिनों तक घूमती है।
  2. दूसरा -- आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में आपके और मेरे पास महंगी घड़ी तो है, लेकिन न आपके पास समय है और न ही मेरे पास। हालाँकि कुछ आपको भी कहना है और मुझे सुनना है और कभी मुझे कहना है आपको सुनना है। इंसान हैं तो बात-चीत तो होगी ही, बस कमी है तो समय की।
अब आप समझ ही गए होंगे कि “चलते-चलते” नाम मैंने क्यों रखा है? अब आपको इस ब्लॉग की ख़ासियत के बारे में भी बता दें। यहाँ आपको थोड़ा-सा अटपटा महसूस हो सकता है, क्योंकि यहाँ मैं वहीं हिन्दी लिखूँगा जो वास्तव में होती है। बाक़ी आप पढ़ेंगे तो आपको ख़ुद-ब-ख़ुद महसूस होगा। हाँ, पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा, क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया ही वह पत्थर है जिस पर मैं ख़ुद को रगड़कर आपके क़ाबिल बनाउँगा।
धन्यवाद!
फिर मिलेंगे ‘चलते-चलते’

नोटबंदी महायज्ञ के 50 दिनों के अनुष्ठान से किसको क्या मिला ?

मंगलवार, 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे एक ऐसी घोषणा हुई, जिस पर एकबानगी यकीन करना मुश्किल था. लोग एकदम से बेचैन हो उठे. कोई इस घोषणा की पुष्...