आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,
मोदी जी आपने कालिदास की वह कहानी तो सुनी ही होगी, जिसके लिए उन्हें मूर्ख का तमगा मिला. वैसे तो आप में और कालिदास जी में काफी अंतर है. वह अंतर यह है कि कालिदास जिस पेड़ की डाली पर बैठे थे उसे वे ख़ुद ही काट रहे थे और आप जिस पेड़ की डाली पर हैं उसे आपके शुभचिंतक काट रहे हैं.
कालिदास जी को एक ओर जहां उनकी विद्वता के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें मूर्ख की श्रेणी में भी रखा गया है. हाल के कुछ दिनों से जिस तरह से आपके फ़ैसले हो रहे हैं उनमें कालिदास की मूर्खता वाली छवि साफ़ नज़र आ रही है.
आपने 8 नवंबर को रात 8 बजे नोटबंदी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन आपने दूर का नहीं सोचा. क्योंंकि शायद आप संस्कृत के इस श्लोक में यक़ीन नहीं करते हैं कि 'अग्र सोची सदा सुखी'. नोटबंदी के बाद जिस तरह से देश के हालात बदले उससे आपको भी अफ़सोस हो ही रहा होगा.
आपके ज़ेहन में यह बात बार-बार उफान मार रही होगी कि बिना तैयारी नोटबंदी का फ़ैसला ग़लत था. हालात को देखकर यह भी कह सकते हैं कि वह फ़ैसला आपका नहीं था, क्योंकि इतना तो देश के लोगों को मालूम ही है कि आपके फ़ैसले बिना तैयारियों के नहीं होते.
मोदी जी, ज़रा सोचिए कि हम स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने जाते है और पहुँचने पर पता चलता है कि ट्रेन रद्द कर दी गई है या उसकी जगह दूसरी ट्रेन को दूसरे समय पर रवाना किया जाएगा तो कितनी परेशानी होती है. यहां तो नोटबंद के नियमों मे रोज़ बदलाव हो रहे हैं. तो सोचिए लोगोंं की क्या हालत हो रही है.
यहां एक और बात ग़ौर करने वाली है कि जनता इतना कष्ट सहते हुए भी आपके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा रही है, क्योंकि आपने उसे अच्छे दिनों का सपना दिखा रखा है, लेकिन अब जनता के तेवर बदलने लगे हैं.
नोटबंदी के बाद विपक्षी दलों ने कहा कि मोदी सरकार ने नोटबंदी की जानकारी अपने लोगों को पहले ही दे दी थी तो सरकार की ओर से बयान आया कि नोटबंदी की जानकारी कुछ तय लोगों को छोड़कर बाक़ी किसी को नहीं थी. वहीं दूरदर्शन के एक पत्रकार के दावे को मानें तो नोटबंदी पर आपके भाषण की रिकॉर्डिंग 1 महीने पहले ही हो गई थी.
आपने नोटबंदी की घोषणा कालेधन को निकालने के लिए की, लेकिन पता चला कि कालेधन रातों-रात सफ़ेद किए जा रहे हैं. नोट बदलवाने के लिए आम आदमी लाइन में खड़ा मौत को गले लगा रहा है और नेताओं के लिए रात में भी बैंक खोले जा रहे हैं.
महाराष्ट्र के सहकारी बैंकों में बैक डेट में ड्राफ़्ट बने, बॉण्ड ख़रीदे गए और पैसे सफेद किए गए. तो क्या ये पैसे सफ़ेद करवाने वाले आम आदमी थे. बिल्कुल नहीं, ये वे लोग थे जिनके कालेधन को निकालने के लिए आपने नोटबंदी की. स्थिति यथावत है.
नोटबंदी के बाद आपने सोना पर धावा बोला, आपने घर में सोना रखने की सीमा तय की. आपके नए क़ानून के मुताबिक विवाहित महिलाएँ घर में 500 ग्राम, अविवाहित महिलाएँ 250 ग्राम सोना और पुरुष 100 ग्राम सोना रख सकते हैं. वहीं पुश्तैनी गहनों पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.
आपने यहाँ भी वही ग़लती की जो आपने नोटबंदी के समय की थी. आपने इस बार भी आगे-पीछे का कुछ नहीं सोचा, बस क़ानून बना दिया. अब यहाँ सवाल ये है कि आप कैसे तय करेंगे कि किसी के घर में रखा गहना पुश्तैनी है, क्योंकि यदि आपको ही अपने पुश्तैनी गहनों का सबूत देना हो तो आपको चक्कर आ जाए.
यह भी तो हो सकता है कि किसी के पास पुश्तैनी गहने ठीक-ठाक हैं लेकिन वह अपनी स्थिति को सुधारने के लिए उन गहनों का इस्तेमाल नहीं करता हो, बल्कि वह उसे वह अपने पुरखों के निशानी के तौर पर रखना चाहता हो. फिर ऐसे में तो आप उसे गिरफ्तार कर लेंगे, क्योंकि आपके क़ानून के हिसाब से वह कालाधन रखने वाला धनकुबेर है.
चलते-चलते एक बार आपसे फिर कहूंगा कि आप प्लीज़ कालिदास मत बनिए.
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