भूख क्या होती है? इसे जानने के लिए किसी पुख़्ता प्रमाण की ज़रूरत नहीं है, यह अपने आप में एक पुख़्ता प्रमाण है। इससे वे सभी जीव वाकिफ़ है जिनमें प्राण है। चाहे वह इंसान हो, हैवान हो, शैतान हो, या फिर भगवान ही क्यों न हो। यह एक ऐसी बला है जो प्रत्येक जीव को सताती है।
आज भी पुरी दुनिया में खाना खाने से मरने वालों की संख्या, भूख से मरने वालों की संख्या से कम ही है। थोड़ी देर के लिए यदि सोचा जाए कि भगवान ने सभी जीवों को वगैर पेट का धरती पर भेजा होता तो क्या होता। मेरे ख़्याल से कुछ भी नहीं होता और कुछ होता भी तो वह विनाशकारी होता। सबलोग केवल मौज-मस्ती ही करते। ना कोई किसी का नौकर होता ना ही कोई किसी का मालिक होता, क्योंकी भूख तभी लगेगी जब जीव के पास पेट होगा। ये भूख ही तो जो सबको अपनी ऊँगलियों पर नचाती है वरना किसी को क्या पड़ी है जो किसी के यहाँ जा कर नौकरी करे और दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करे। कोई ज़्यादा खाने से मर रहा है, तो किसी को खाना नसीब ही नहीं हो रहा है।
जब भूख से किसी की मौत होती है तो मीडिया के लिए एक पाँच मिनट की कवरेज़ होती है, सरकार एक दिन दुःख के सिवाय कुछ भी व्यक्त नहीं करती है, फ़िल्मकारों को फ़िल्म बनाने का आइडिया मिलता है। यहाँ उस भूखे आदमी को खाना के अलावा सबको अपने काम का कुछ-ना-कुछ मिल ही जाता है। हद तो तब हो जाती है जब उससे यह पूछा जाता है कि आपने चार दिन से खाना नहीं खाया, आपको कैसा लग रहा है? यही सवाल उसे खाना देकर भी पूछा जा सकता है कि आपने चार दिन बाद खाना खाया, अब आप कैसा महसूस कर रहे है।
वैसे भूख को मिटाया तो नहीं जा सकता है लेकिन इससे होने वाली मौत को रोका जा सकता है। सऊदी अरब में एक ऐसा शहर है जहाँ अलग-अलग सार्वजनिक जगहों पर फ़्रिज़ रखा गया है जिसमें लोग अपने घर का बचा खाना रख जाते है फिर जिसे ज़रूरत होती है वह उस खाना को ले जाता है। कुछ दिन पहले ज़िंदगी नाम के एक मनोरंजन चैनल पर एक सीरियल प्रसारित हो रहा है “काश मैं आपकी बेटी होती” इस सीरियल के एक एपिसोड में एक दृस्य में एक ग़रीब माँ अपने बच्चों से यह प्रार्थना कर रही है कि आज की रात उन्हें भूख सहनी होगी, क्योंकी घर में सिर्फ़ एक मुठ्ठी चावल है जो दिन भर मेहनत करने के बाद आने वाले उन बच्चों के पिता को दिया जाने वाला है और बच्चों को यह अभिनय करना है कि उन्होंने पहले ही खाना खा लिया है। पिता के लौटने पर बच्चों ने अविश्वसनीय अभिनय किया। परंतु निवाला लेते समय सहज ही छोटे बच्चे का मुँह निवाला की उम्मीद से खुला जैसा की पहले से होता आया है। पिता को यह समझने में देर नहीं लगी किसी ने नहीं खाया है। सब केवल नाटक कर रहे है। पिता ने कहा थोड़ा ही सही, लेकिन सब लोग खायेंगे। भूख को सब लोग बाँटकर सहेंगे।
सदियों से एक परंपरा चली आ रही है कि ख़ुदा-ना-ख़ास्ता किसी के घर मौत हो जाती है तो दो-तीन दिन तक घर का चुल्हा नहीं जलाया जाता है, बल्कि पड़ोसी के घर से खाना आता है। इसी परंपरा से जुड़ी एक कहानी है जिसमें एक गरीब परिवार में चार सदस्य है। माता,पिता, लड़का और लड़की। एक दिन उस लड़के कि अचानक तबीयत ख़राब हो जाती है और वह लड़का ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा होता है। ये बात जब उसकी बहन को पता चलता है तो वह अपने पापा से पुछती है कि पापा भैया कब मरेगा। उस छोटी सी बच्ची को तो यह भी नहीं मालूम कि मौत क्या होती है, लेकिन उसे यह मालूम है कि भूख क्या होती है और खाना क्या होता है। उसे यह मालूम है कि भैया के मरने पर पड़ोसी के घर से स्वादिष्ट खाना आएगा। उसकी छोटी सी स्मृति में दादी की मौत पर पड़ोसी के घर से आया खाना हिलोरे मार रहा है। वह भूख को जानती है। उसी खिलौने से तो खेल कर वह बड़ी हुई है। ऐसी बहुत कहानियाँ हैं जो आपको ऐसे निचोड़ देगी, जैसे धोबी धोबी-घाट पर कपड़े को निचोड़ता है।




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