रविवार, 13 मार्च 2016

नहीं सीखनी ऐसी आर्ट ऑफ लिविंग


ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखने की क्या ज़रुरत जिसे सीखने जाने का रास्ता सैकड़ो किसानों की बर्बाद हुई फ़सल से होकर जाती हो। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि जिस 30 फ़ीट चौड़े रास्ते से आज बीएमडबल्यू, फ़रारी या और भी महंगी गाड़ियों से लोग बाबा “डबल श्री” (श्री श्री 1 लाख 8 श्री कहना ज़्यादा उचित होगा) से जीने की कला सीखने जा रहे हैं, वह किसानों की उस लहलहाती फ़सलों को रौंदकर बनाई गई है जिसे उन्होंने अपना पेट पालने के लिए अपने पसीने से सिंचा था। बदले में उन्हें क्या मिला, इसका जवाब यह है कि उन्हें धमकाया तक भी गया, ताकि वे मुआवज़े की माँग न कर सकें। वाह रे! जीने की कला सीखाने वाले और सीखने वाले, साथ में मुकदर्शक बनी वह सरकार जो कल तक किसानों को फ़सल बीमा का चोला पहनाकर आगामी चुनाव की तैयारी कर रही थी और वह रे वित्तमंत्री साहब जिन्होंने बजट में किसानों को बड़े ही ख़ूबसूरत और कभी पूरे न होने वाले सपने दिखाए।



इस कार्यक्रम में पहुँचे ‘परिधान मंत्री’ के मुखार्विंद से निकली वे दो पंक्तियाँ भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होनी चाहिए जिसमें उऩ्होंने कहा, "हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होनी चाहिए, लेकिन यदि हम अपनी ही परंपरा और संस्कृति की ही बुराई करेंगे तो बाक़ी क्या कहेंगे। यह कला का कुंभ है।"
अब सवाल यह है ऐसे कला के कुंभ में डुबकी लगाने और ऐसी आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखा कर भारत का सिर विश्वपटल पर ऊँचा करने की आवश्यकता ही क्या है? क्या ज़रूरत है दुनिया को दिखाने की कि हमारे पास श्री श्री रविशंकर जी महाराज जैसे महारथी हैं जो जीने की ऐसी कला सीखा रहे हैं जिसमें करोड़ो रुपये ख़र्च हो रहे हों।
अब इस कार्यक्रम की शुरूआत की बात करें तो शुरूआत में भी ड्रामा कम नहीं हुआ। जुर्माने को लेकर जो नौटंकी हुई उससे भी आप भली-भाँति वाक़िफ़ हैं, इसलिए ज़्यादा तह में जाने की दरकार नहीं है। लेकिन यह बताना वाक़ई आवश्यक है कि जो बाबा अपने महोत्सव में क़रीब 25.63 करोड़ रुपये ख़र्च कर रहे हैं, उनकी संस्था द्वारा 5 करोड़ जुर्माना देना वास्तव में बड़ी बात है। मेरे ख़्याल से तो जुर्माना लेना ही नहीं चाहिए, क्योंकि प्रकृति के नुक़सान की भरपाई जुर्माने से संभव नहीं है, चाहे जुर्माना कितना भी बड़ा ही क्यों न हो।
इतना सब जानने के बाद भी यदि उन अनुमानतः 35 लाख लोगों के साथ आप जीने की कला यानी आर्ट ऑफ़ लिविंग के कुंभ (मेरे ख़्याल से महाकुंभ) में डुबकी लगाने जा रहे हैं तो आपको मेरी ओर से अनंत शुभकामनाएँ, आपकी मनोरथें पूरी हों! आज मेगा शो का अंतिम दिन भी है।
आज के लिए इतना ही
फिर मिलेंगे चलते-चलते

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