मंगलवार, 5 जनवरी 2016

ब्लॉग का नाम चलते-चलते ही क्यों?

सबसे पहले तो आप सभी का “चलते-चलते” ब्लॉग पर स्वागत है। अब आपके ज़ेहन में एक सवाल उठ रहा होगा कि आख़िर इस ब्लॉग का नाम “चलते-चलते” ही क्यों? 

इसके दो कारण हैं -

  1. पहला -- कई दफ़ा ऐसा होता है कि आप कहीं की यात्रा पर होते हैं या फिर किसी से कम समय में जल्दी-जल्दी अपनी बात पूरी करते हैं, लेकिन इस मर्तबाँ कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं या कोई ऐसी बात हो जाती है जो आपके ज़ेहन में कई दिनों तक घूमती है।
  2. दूसरा -- आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में आपके और मेरे पास महंगी घड़ी तो है, लेकिन न आपके पास समय है और न ही मेरे पास। हालाँकि कुछ आपको भी कहना है और मुझे सुनना है और कभी मुझे कहना है आपको सुनना है। इंसान हैं तो बात-चीत तो होगी ही, बस कमी है तो समय की।
अब आप समझ ही गए होंगे कि “चलते-चलते” नाम मैंने क्यों रखा है? अब आपको इस ब्लॉग की ख़ासियत के बारे में भी बता दें। यहाँ आपको थोड़ा-सा अटपटा महसूस हो सकता है, क्योंकि यहाँ मैं वहीं हिन्दी लिखूँगा जो वास्तव में होती है। बाक़ी आप पढ़ेंगे तो आपको ख़ुद-ब-ख़ुद महसूस होगा। हाँ, पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिएगा, क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया ही वह पत्थर है जिस पर मैं ख़ुद को रगड़कर आपके क़ाबिल बनाउँगा।
धन्यवाद!
फिर मिलेंगे ‘चलते-चलते’

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